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60 के बाद नौकरी से रिटायरमेंट, तो राजनीति में क्यों नहीं? युवाओं ने उठाया बड़ा सवाल

देश में सरकारी कर्मचारियों को 60 वर्ष की उम्र के बाद यह कहकर सेवानिवृत्त कर दिया जाता है कि अब आराम करने और नई पीढ़ी को मौका देने का समय है। ऐसे में आम जनता के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि जब सरकारी सेवा में उम्र सीमा तय है, तो राजनीति में नेता और मंत्री जीवनभर चुनाव क्यों लड़ते रहते हैं?

लोगों का कहना है कि संविधान और नियम सभी के लिए समान होने चाहिए। यदि एक कर्मचारी को उम्र के आधार पर रिटायर किया जाता है, तो जनप्रतिनिधियों के लिए भी कोई स्पष्ट आयु सीमा तय होनी चाहिए। युवाओं का मानना है कि देश में नई सोच, नई तकनीक और तेज फैसलों के लिए राजनीति में युवा नेतृत्व को आगे आने का अवसर मिलना जरूरी है।

हालांकि दूसरी तरफ कुछ लोग यह भी मानते हैं कि राजनीति अनुभव का क्षेत्र है। कई वरिष्ठ नेताओं ने अपने अनुभव और समझ से देश व राज्यों को दिशा दी है। इसलिए केवल उम्र के आधार पर किसी को राजनीति से बाहर करना भी उचित नहीं माना जा सकता।

लेकिन वर्तमान समय में युवाओं की बढ़ती आबादी, बेरोजगारी, शिक्षा, डिजिटल विकास और नई चुनौतियों को देखते हुए यह बहस तेज हो गई है कि क्या राजनीति में भी एक तय उम्र के बाद सक्रिय पदों से संन्यास का नियम होना चाहिए।

जनता की राय

सरकारी नौकरी में रिटायरमेंट है तो राजनीति में भी होना चाहिए।

युवाओं को नेतृत्व में ज्यादा अवसर मिलना चाहिए।

अनुभव जरूरी है, लेकिन नई पीढ़ी की भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

संविधान और नियम सभी पर समान रूप से लागू होने चाहिए।

अब बड़ा सवाल यही है —
क्या देश में राजनीति के लिए भी अधिकतम उम्र सीमा तय होनी चाहिए, या जनता का वोट ही अंतिम फैसला है?

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