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एक के बाद एक परीक्षा का लीक होना बहुत ही चिंताजनक बात है। इस तरह से तो व्यवस्था से भरोसा ही उठ जाएगा भाई साहब,श्र है मान से सुबह-सुबह पार्क में ,,,

मिलते ही मैंने कहा। मैं अंतरराष्ट्रीय चिंताओं पर मंथन कर रहा था, लेकिन श्रीमान के चेहरे पर उभरी चिंता के सामने दुनिया की फ़िक्र काफी हल्की जान पड़ी। श्री मान की हमेशा सड़क के बायीं तरफ हमेशा चलने वाले हुए। सबेरे सबेरे बच्चों को स्कूल बस तक छोड़ कर पार्कस में टहलना बरसों से उनका निहित कार्य क्रम रहा, वक्त पर आफिस पहुंचना बास की पुतली घूमने से पहले फाइलें निपटाना और शाम को लौटते समय सब्जी का थैला लिए घर पहुंचना उनके लिए रुटीन रहा। ऐसे तो मासूम से हुए वो पर आज वह परीक्षा पे चर्चा के मूड में थे, क्यों कि बिटिया को दोबारा इम्तिहान में बैठना था। मैंने उन्हें ढांढस बंधाया कि कोचिंग में लगे तीन लाख रुपए पर भरोसा न हो तो कम से कम बिटिया की काबिलियत पर भरोसा रखें। पर उनका चेहरा ऐसे कैप्टन जैसा हुआ जा रहा था जिसकी टीम जीतने वाली हो और ऐन वक्त पर बारिश से पाइंट बांटने की नौबत आ जाए। कुछ लोगों की वजह से पूरा सिस्टम खराब हो जाता है भाई साहब। इन्हें तो सूली पर टांग दिया जाए तो कुछ सबक मिले। श्री मान ख ने गुस्से से कहा, लेकिन सूली पर चढ़ाएगा कौन,, सवाल सुन श्री मान अचानक अचकचा गये, उनके चेहरे पर निल बटे सन्नाटा देख मैंने हंसाने की कोशिश में कहा, पहले वाला जमाना ही ठीक था, सबको मौका मिलता था, एग्जाम सेंटर की चारदीवारी पर हुजूम लगा रहता। बच्चे खिड़की से पर्चा फेंकते किसी के हाथ लगता,साल्व किया जाता था सबके लिए। फिर बाप भाई दोस्त किसी ओलंपियन की तरह जबाब वाले पन्ने को गेंद बनाकर अंदर फेंकते,पूरा समाज बाद था, आज तो सारा खेल कुछ लोगों के हाथ में चला गया है। पूंजीवाद में यही तो खराबी है। श्री मान ख कुछ कहना चाहते थे लेकिन किचकिचा के रह गए।

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Comment
  • Dhanendera Kumar Mishra

    बिल्कुल उपयोगी विषय है कि भरोसा कैसे कायम किया जाए परिश्रमी क्षात्रों का।