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रोजगार नहीं, अब उद्यम चाहिए बिहार में 9347 नए उद्यमियों का चयन क्या बदल देगा व्यवस्था?





विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार



पटना: बिहार लंबे समय से बेरोजगारी, पलायन और सरकारी नौकरी की अंधी दौड़ से जूझता रहा है।

हर परीक्षा में लाखों आवेदन, हर भर्ती में घोटाले के आरोप और हर गांव से महानगरों की ओर मजदूरी के लिए पलायन—यह बिहार की सामाजिक-आर्थिक सच्चाई बन चुकी थी।

लेकिन अब बिहार सरकार की मुख्यमंत्री उद्यमी योजना एक नया सवाल खड़ा कर रही है—क्या बिहार नौकरी मांगने वाला राज्य नहीं, बल्कि रोजगार पैदा करने वाला राज्य बन सकता है?



वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए 9347 नए आवेदकों का चयन सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह बिहार की अर्थव्यवस्था और सामाजिक सोच में परिवर्तन का संकेत भी है।



SC/ST वर्ग से 2000,

अति पिछड़ा वर्ग से 2000,

महिला वर्ग से 2000,

युवा वर्ग से 2000,

अल्पसंख्यक वर्ग से 1247,

दिव्यांगजन वर्ग से 100 ,

लोगों का चयन यह दर्शाता है कि सरकार ने उद्यमिता को सामाजिक न्याय से जोड़ने की कोशिश की है।



सबसे बड़ा सवाल — क्या यह चयन जमीन पर उद्योग बन पाएगा?



योजना का सबसे मजबूत पक्ष है कि चयन Computerized Randomization से हुआ।



बिहार जैसे राज्य में, जहां सरकारी योजनाओं पर भाई-भतीजावाद, दलाली और राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप लगते रहे हैं, वहां यह प्रणाली पारदर्शिता की दिशा में सकारात्मक कदम मानी जा सकती है।



लेकिन वास्तविक परीक्षा अब शुरू होती है।

क्योंकि बिहार में योजनाएं घोषित होना आसान है, परंतु उनका सफल क्रियान्वयन हमेशा चुनौती रहा है।



सवाल यह है कि—

क्या चयनित युवाओं को समय पर राशि मिलेगी?

क्या बैंक बिना भ्रष्टाचार और कमीशन के ऋण स्वीकृत करेंगे?

क्या प्रशिक्षण और मार्केटिंग सहायता वास्तव में उपलब्ध होगी?

क्या गांव स्तर पर उद्योग लगाने वालों को बिजली, सड़क और बाजार मिलेगा?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर “नहीं” रहा, तो यह योजना भी सिर्फ सरकारी विज्ञापन बनकर रह जाएगी।



बेरोजगारी से आत्मनिर्भरता की ओर,

बिहार में सरकारी नौकरी को ही “करियर” मानने की मानसिकता गहरी है।

ऐसे माहौल में उद्यमिता आधारित मॉडल सामाजिक बदलाव ला सकता है।



जब एक युवा अपना उद्योग शुरू करता है, तब वह केवल स्वयं नहीं कमाता—वह अन्य लोगों को भी रोजगार देता है।

यही कारण है कि दुनिया की मजबूत अर्थव्यवस्थाएं सरकारी नौकरी पर नहीं, बल्कि छोटे और मध्यम उद्योगों पर खड़ी हैं।



मुख्यमंत्री उद्यमी योजना का यह मॉडल यदि सही तरीके से लागू हुआ, तो बिहार में—

माइक्रो इंडस्ट्री,

फूड प्रोसेसिंग,

टेक्सटाइल,

कृषि आधारित उद्योग,

डिजिटल सेवाएं,

महिला स्वयं सहायता आधारित उत्पादन इकाइयां

जैसे क्षेत्रों में नई क्रांति आ सकती है।



महिलाओं और वंचित वर्गों के लिए बड़ा अवसर

इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को प्राथमिकता दी गई है।



महिला वर्ग के लिए 2000 सीटें यह संकेत देती हैं कि सरकार आर्थिक सशक्तिकरण को महिला नेतृत्व से जोड़ना चाहती है।



यदि गांव की महिलाएं स्वरोजगार से जुड़ती हैं, तो इसका असर सीधे परिवार की शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिति पर पड़ेगा।



SC/ST और अति पिछड़ा वर्ग को शामिल करना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिहार में आर्थिक पिछड़ापन अक्सर जातीय और सामाजिक पिछड़ेपन से जुड़ा रहा है।

लेकिन खतरा भी कम नहीं

बिहार में कई योजनाएं “कागजी सफलता” बनकर रह गईं।



अक्सर देखा गया कि—

फर्जी यूनिट दिखाकर पैसा निकाल लिया गया,

उद्योग शुरू होने से पहले बंद हो गए,

बैंक और बिचौलियों का गठजोड़ सक्रिय हो गया,

प्रशिक्षण सिर्फ फाइलों तक सीमित रह गया।

यदि इस योजना में भी निगरानी कमजोर रही, तो यह भ्रष्टाचार का नया रास्ता बन सकती है।



सरकार को चाहिए कि—

हर चयनित यूनिट की जियो-टैगिंग हो,

उद्योग की वास्तविक प्रगति ऑनलाइन सार्वजनिक हो,

जिला स्तर पर सोशल ऑडिट हो,

और लाभार्थियों की सफलता/विफलता रिपोर्ट जनता के सामने रखी जाए।



निष्कर्ष

9347 नए उद्यमियों का चयन केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि बिहार के भविष्य की दिशा तय करने वाला प्रयोग है।

यदि यह योजना ईमानदारी और पारदर्शिता से लागू हुई, तो बिहार “पलायन करने वाले युवाओं” का राज्य नहीं, बल्कि “उद्योग खड़ा करने वाले युवाओं” का राज्य बन सकता है।



लेकिन यदि व्यवस्था भ्रष्टाचार, दलाली और राजनीतिक संरक्षण की पुरानी बीमारी से बाहर नहीं निकली, तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी बिहार के युवा फिर रेलवे भर्ती और प्रतियोगी परीक्षाओं की कतार में खड़े दिखाई देंगे।



अब फैसला सिर्फ सरकार का नहीं, बल्कि सिस्टम की नीयत और समाज की जागरूकता का भी है।

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