कविता : जाता
जाता है समय धीरे-धीरे,
रेत सा मुट्ठी से फिसल जाता,
कल जो अपना लगता था,
आज कहीं धुंध में खो जाता।
जाता है बचपन का मौसम,
कागज़ की नावें संग लेकर,
बरसाती गलियों की खुशबू,
माँ की आवाज़ें मन में भरकर।
जाता है हर एक दिन जैसे
सूरज शाम में ढल जाता,
जीवन का हर रंग अनोखा
आते-आते चल जाता।
जाता है चिड़ियों का झुंड
सर्द हवाओं से डरकर,
पर छोड़ जाता है आँगन में
गीत मधुर कुछ गुनगुनाकर।
जाता है जब कोई अपना,
सूना हो जाता है दिल,
यादों की गठरी रह जाती,
आँखों में ठहरा सा सिलसिल।
जाता है प्रेम कभी चुपके,
बिना शोर किए दुनिया में,
फिर भी उसकी महक बची रहती
फूलों की कोमल क्यारी में।
जाता है पतझड़ भी आखिर,
सूखे पत्तों की चाल लिए,
लेकिन उसके बाद ही देखो
बसंत आता खुशहाल लिए।
जाता है दुख का अँधियारा,
यदि मन में विश्वास रहे,
टूटे सपनों के टुकड़ों में भी
जीने की कोई आस रहे।
जाता है आदमी इस जग से,
खाली हाथ ही अंत समय,
ना धन जाता, ना वैभव जाता,
साथ चले बस कर्म अमय।
जाता है राजा और फकीर,
सबको एक दिन जाना है,
इस मिट्टी के बने खिलौने को
मिट्टी में मिल जाना है।
जाता है जो, वह सिखला जाता
जीवन का गहरा सार,
क्षणभंगुर है यह संसार सारा,
प्रेम ही रहता है सदा अपार।
इसलिए जब तक साँसें हैं,
मन में दीप जलाए रखना,
जो भी मिले राहों में तुमको,
हँसकर उसे गले लगाए रखना।
क्योंकि जाता हर पल वापस नहीं,
वक्त कभी रुक पाता नहीं,
जीवन बहती नदी की धारा,
जो ठहरे, वह जीवन नहीं।