logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

*भारत को आर्थिक संकट की ओर धकेल रही हैं मोदी सरकार की नीतियां* *(आलेख : जयप्रकाश नारायण)*

*प्रकाशनार्थ*

*भारत को आर्थिक संकट की ओर धकेल रही हैं मोदी सरकार की नीतियां*
*(आलेख : जयप्रकाश नारायण)*

कमर्शियल गैस के दाम 30% बढ़ा दिए गए। पिछले डेढ़ महीने में 1600 रुपये में मिलने वाला कमर्शियल गैस सिलेंडर अब 3070 रुपये में मिल रहा है। यह सिर्फ मूल्य वृद्धि का सवाल नहीं है, बल्कि संघ मार्का हिंदुत्व विदेश नीति के दिवालियापन का संकेत है, जो नफरत, हिंसा, साम्राज्यवाद के समक्ष समर्पण और सत्ता के दुरुपयोग द्वारा चुनाव जीत लेने के समग्र प्रोजेक्ट का स्वाभाविक परिणाम है।

यह सब वित्तीय पूंजी के जटिल साम्राज्य के साथ अंत:क्रिया में संघी नीति के दिवालिएपन के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा है। विश्व शक्ति संतुलन के बदलते दौर में यह स्पष्ट हो चुका है कि ‘नागपुर विद्यालय’ से निकले नेता, कार्यकर्ता, विचारक, अर्थशास्त्री न आधुनिक दुनिया की समझ रखते हैं और न वैश्विक राजनीति के किसी भी जटिल सवाल को समझने एवं अंतर्विरोधों को हल करने की सामान्य योग्यता।

वे भारत की विविधता में मौजूद अंतर्विरोध को जटिल बनाकर सत्ता का खेल तो खेल सकते हैं और इसे लोकतांत्रिक भारत को कमजोर करने की परियोजना की तरफ धकेल सकते हैं, लेकिन देश के बुनियादी सवालों को हल करने की योग्यता उनमें नहीं है। सुलगते आदिवासी इलाके, जलता मणिपुर और तबाह होते उद्योग, कृषि को कॉरपोरेट हवाले करने के लिए, नागरिकता के सवाल को नासूर में बदलकर, धार्मिक विभिन्नता को अपराध के स्तर पर उन्नत कर कॉरपोरेट कृपा से सत्ता की कुर्सी पर तो बैठे रह सकते हैं, लेकिन विकसित होती राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के जटिल मोड़ पर 147 करोड़ भारतीयों के वास्तविक जीवन के मुद्दों से जूझने, टकराने और उसे हल करने की ईमानदार नियति इनके पास नहीं है। यही कारण है कि खाड़ी के संकट ने इनके नीतिगत दीवालिएपन को देश और दुनिया के सामने खोल करके रख दिया है।

जनवरी से ही यह सूचना मिलने लगी थी कि ईरान पर किसी भी समय हमला हो सकता है। ओमान की मध्यस्थता में चल रही वार्ता में ईरानी लचीलेपन के बाद भी अमेरिकी हठधर्मिता से भविष्य के संकेत मिलने लगे थे। यह स्पष्ट हो गया था कि अमेरिकी नीयत किसी भी तरह की वार्ता को मंजिल तक पहुंचाने की नहीं है। भू-राजनीति के जानकारों में इस बात पर एक राय थी कि शीघ्र ही ईरान पर हमला होने वाला है। इसलिए आंतरिक राजनीति की जरूरत, नफरती दृष्टि और अदूरदर्शी समझ के कारण अचानक भारतीय प्रधानमंत्री ने इजरायली यात्रा पर जाने का समय सोच-समझ कर चुना होगा। आश्चर्य तो यह है कि यात्रा की घोषणा इज़रायल से की गई।

पीएम मोदी के इज़रायल पहुंचने के बाद जो कुछ दिखावा, तमाशा, प्रोपेगेंडा हुआ, वह सब अपनी जगह है। हीनग्रंथि से पीड़ित खोखले विचार वाले क्षुद्र व्यक्ति के लिए यह सब उपलब्धि हो सकती है, लेकिन पूंजी के मालिकों के क्रूर यथार्थवादी दुनिया में इस तमाशे का कोई महत्व नहीं होता। पूंजी के हृदयहीन संचालकों के लिए यह सिर्फ खेल की स्क्रिप्ट ही हो सकती है. (यहां मैं एपस्टीन फाइल या मित्र अडानी पर चल रहे मुकदमे को मुख्य कारण नहीं मानता)। इस अहम मोड़ पर मोदी ने इसराइल को ‘फादर ऑफ द नेशन’ कह कर अपने बौद्धिक दिवालिएपन की जो तस्वीर छोड़ी, वह भारत के लिए आत्मघाती था।

महज 80 वर्ष की उम्र वाले साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी परियोजना से जन्मे कृत्रिम देश और लाखों मुस्लिम धर्मावलंबी फिलिस्तीनियों के नरसंहार को नजरअंदाज कर प्रफुल्लित हो मोदी ने जो कुछ कहा, आज देश उसकी कीमत चुका रहा है। किस दृष्टि समझ और सोच के कारण संघी राष्ट्रवाद इजरायल को ‘फादर ऑफ नेशन’ मानता है, यह उनके निष्कृष्टतम चिंतन और साम्राज्यवादी प्रेम का बदतरीन नमूना है।

खैर, मोदी के आने के 36 घंटे के बाद ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमला हुआ। यह सब दुनिया के सामने है। हमले के 60 से ज्यादा दिन हो चुके हैं। मोदी सरकार की साम्राज्यवादपरस्त समर्पणकारी विदेश नीति के दुष्परिणाम भारत के घरेलू बाजार और नागरिकों के जीवन पर एक हफ्ते के अंदर ही पड़ने लगा है। सबसे पहले हमने सूरत के सेरेमिक इंडस्ट्री को बंद होते देखा।

रेलवे स्टेशनों पर प्रवासी मजदूरों की भीड़ दिखाई दी। जैसे ही सरकार ने चार श्रम कोड को 1 अप्रैल 2026 से लागू किया, मजदूरों का धैर्य जवाब दे गया। पूरी गृहस्थी कंधे पर उठाए दिल्ली के इर्द-गिर्द से लेकर गुजरात, पंजाब तक प्रवासी मजदूर रेलवे स्टेशन पर धक्के खाने लगे। अनेक ख़बरनवीस इसे कोरोना काल जैसे हालात का नाम देने लगे। प्रवासी मजदूरों का एक ही कथन था कि हम खाना पकाने की गैस खरीद पाने की स्थिति में नहीं है। हमारा पॉकेट जवाब दे रहा है। सरकार ने इसे विपक्ष के मत्थे मढ़ दिया और आरोप लगाते हुए कहा कि वह देश में पैनिक क्रिएट कर‌ रहा है। आत्मनिर्भर भारत का राग अलापने वाले रोने, गाने, नाचने लगे। महिलाओं के अधिकार की आड़ में भी वे अपना असली चेहरा छुपा नहीं सके। हमेशा की तरफ बिका हुआ मीडिया विपक्ष को कटघरे में खड़ा कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गया।

लेकिन पूंजी के मालिकान जानते हैं कि पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली और सभ्यता में सब कुछ ‘आना-पाई-कौड़ी’ से तय होता है। यही कारण है कि पांच राज्यों के चुनाव प्रचार के दौरान ढोल, नगाड़े, डमरू, त्रिशूल, फुटबॉल की गेंद उछालने के बाद मोदी अंत में कमर्शियल गैस सिलेंडर का दाम 30% बढ़ाकर आर्थिक संकट से उबरना चाहते हैं। लेकिन यह संकट तो बहुआयामी है।

पिछले 12 वर्षों में भारत सरकार ने जितना निवेश राजनीति और खरीद-फरोख्त, दिखावा, प्रचार और धर्म उद्योग में किया है, उसने अंदर से भारत‌ को खोखला बना दिया है।

मैन्युफैक्चरिंग उद्योग बैठ‌ गया और भारत उपभोक्ता आधारित अर्थव्यवस्था (कंज्यूमर इकोनॉमी) वाले देश में बदल गया है। यह खोखलापन ही है, जिसके कारण चार हजार किमी दूर चल रहे युद्ध की आग भारत के लिए गहरा संकट पैदा कर रही है। बची-खुची माली स्थिति अमेरिकी दबाव के समक्ष समर्पण के बाद तबाही की शिकार हो गई।

देश की अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर संक्षेप में नज़र डालें तो कई चिंताजनक संकेत दिखाई देते हैं। विदेशी पूंजी लगातार देश से बाहर जा रही है। वर्ष 2024-25 में लगभग 1.70 लाख करोड़ रुपये की विदेशी पूंजी निकली, जबकि 2025-26 में अब तक करीब 1.80 लाख करोड़ रुपये का विदेशी निवेश भारत छोड़ चुका है। इसका असर घरेलू उत्पादन और व्यापार संतुलन पर पड़ा है, जिससे व्यापार घाटा बढ़ा है।

जो विदेशी निवेश देश में आ भी रहा है, उसका बड़ा हिस्सा उत्पादक क्षेत्रों में नहीं लग रहा। इसके विपरीत कई विदेशी कंपनियां भारत में अपना कारोबार समेट रही हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि भारत धीरे-धीरे उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था के बजाय उपभोक्ता समाज में बदलता जा रहा है और घरेलू उत्पादन लगातार घट रहा है।

ऊर्जा संकट का असर भी विभिन्न उद्योगों पर दिखाई दे रहा है। सूरत का सिरेमिक और हीरा उद्योग, पानीपत, सोनीपत, मानेसर और गुरुग्राम का ऑटोमोबाइल सेक्टर, तथा दिल्ली-एनसीआर के छोटे कारोबार इससे प्रभावित हुए हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्यतः सेवा क्षेत्र पर आधारित है, जो कुल अर्थव्यवस्था में लगभग 49 प्रतिशत योगदान देता है। इसके अलावा लगभग 30 प्रतिशत योगदान कृषि क्षेत्र और 15 से 20 प्रतिशत योगदान औद्योगिक क्षेत्र से आता है।

2011-12 से 2024 के बीच लोगों की वास्तविक आय में लगभग 1.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह संकेत देता है कि कोरोना महामारी के बाद देश में गरीबी और आर्थिक असमानता बढ़ी है।

सरकार की नीतियों, जैसे -- नोटबंदी, जीएसटी और लंबे लॉकडाउन, ने बड़े पैमाने पर आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया। वहीं, निजीकरण को आर्थिक विकास का मुख्य आधार बनाए जाने से स्थायी वेतनभोगी कर्मचारियों की संख्या घटती गई और ठेका मजदूरों की संख्या बढ़ती गई। इससे ठेकेदारी आधारित एक बिचौलिया अर्थव्यवस्था विकसित हुई, जिसने व्यापक मजदूर वर्ग को आर्थिक रूप से और कमजोर किया।

इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में देश में गिग वर्कर्स की संख्या में लगभग 55 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2021-22 में गिग वर्कर्स की संख्या करीब 77 लाख थी, जो 2026 तक बढ़कर लगभग डेढ़ करोड़ हो चुकी है। यदि यही वृद्धि दर जारी रही, तो 2027 तक इनके दो करोड़ तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।

इन गिग वर्कर्स में बड़ी संख्या उच्च शिक्षित युवाओं की है, जो प्रत्यक्ष उत्पादन से जुड़े कार्यों में नहीं हैं। इससे स्पष्ट होता है कि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के कमजोर होने के कारण बड़ी संख्या में युवा मजबूरीवश इस तरह के अस्थायी और असुरक्षित रोजगार की ओर बढ़ रहे हैं। भारत में जो विदेशी निवेश आ रहा है, उसका बड़ा हिस्सा विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र में न जाकर अन्य क्षेत्रों में लगाया जा रहा है।

रोजगार के सीमित अवसरों का असर युवाओं की मानसिक स्थिति पर भी दिखाई दे रहा है। 18 से 34 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 60 प्रतिशत युवा मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं। दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा में मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर चले आंदोलनों ने इस गंभीर स्थिति को उजागर किया है।

इन आंदोलनों में शामिल अधिकांश लोग ठेका मजदूर हैं, जिन्हें निजी ठेकेदारों के माध्यम से उद्योगों में काम पर लगाया जाता है। इनमें से अधिकांश मजदूर लगभग 11 हजार रुपये मासिक वेतन पर काम करते हैं। पिछले आठ वर्षों में उनकी मजदूरी में केवल मामूली बढ़ोतरी हुई है। यह वस्तुतः वेतन स्थिरता या ‘वेतन जाम’ की स्थिति को दर्शाता है।

महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और भोजन पर बढ़ते खर्च को देखते हुए साफ कहा जा सकता है कि वास्तविक मजदूरी में गिरावट आई है, जिसका सीधा असर लोगों की जीवन स्थितियों पर पड़ रहा है। लंबे आंदोलनों के बाद हरियाणा सरकार ने मजदूरी में 30 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश सरकार ने 21 प्रतिशत वृद्धि की घोषणा की है। हालांकि, इन घोषणाओं का वास्तविक लाभ मजदूरों तक किस हद तक पहुंचेगा, यह अभी देखना बाकी है।

उदारीकरण के बाद भी लगभग दस वर्ष पहले तक फैक्ट्रियों और औपचारिक क्षेत्र (फॉर्मल सेक्टर) में सामान्यतः करीब 20 प्रतिशत कर्मचारी ठेका मजदूर होते थे। अब यह संख्या बढ़कर लगभग 41 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यानी जिन उद्योगों में पहले लगभग 80 प्रतिशत स्थायी कर्मचारी हुआ करते थे, वहां अब उनकी हिस्सेदारी घटकर करीब 60 प्रतिशत रह गई है।

यह वही क्षेत्र है, जहां कभी लगभग 8 करोड़ लोग कार्यरत थे, लेकिन पिछले पांच वर्षों में इसमें तेज गिरावट दर्ज की गई है। सरकारी क्षेत्र सहित औपचारिक सेक्टर में भी अब ड्राइवर, चपरासी, सफाई कर्मी, पानी पिलाने वाले कर्मचारी और सुरक्षा गार्ड तक ठेका व्यवस्था के तहत नियुक्त किए जा रहे हैं. यहां तक कि सरकारी दफ्तरों में परिवहन सेवाएं भी निजी ठेकेदारों के माध्यम से संचालित हो रही हैं।

स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर आउटसोर्सिंग के नाम पर संविदा और मानदेय आधारित नियुक्तियां की जा रही हैं। डॉक्टर, प्रोफेसर और इंजीनियर जैसे पेशेवर भी अब स्थायी रोजगार के बजाय फिक्स्ड सैलरी और निश्चित अवधि के अनुबंधों पर नियुक्त किए जा रहे हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि मध्यवर्ग की आर्थिक ताकत कमजोर हो रही है और उसका दायरा लगातार सिमटता जा रहा है।

इसी का असर टैक्स संग्रह पर भी दिखाई दे रहा है। सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में टैक्स कलेक्शन में गिरावट दर्ज की गई है। अब तो सेना जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में भी ‘अग्निवीर’ योजना के तहत निश्चित अवधि की नौकरियां शुरू कर दी गई हैं। यदि यही स्थिति बनी रही, तो सरकारी राजस्व में कमी और कर्ज पर निर्भरता दोनों तेजी से बढ़ सकते हैं।

आमतौर पर 15 से 65 वर्ष की आयु के लोगों को कार्यशील आबादी (वर्किंग पॉपुलेशन) माना जाता है। भारत में यह संख्या लगभग 90 करोड़ के आसपास है, जबकि बाकी आबादी बच्चों और बुजुर्गों की है। यदि कार्यशील आबादी में 45 करोड़ पुरुष और 45 करोड़ महिलाओं को शामिल माना जाए, तो भी अनुमानतः हर पांच में से एक पुरुष रोजगार से बाहर है। यानी वास्तविक रूप से काम करने वाले पुरुषों की संख्या घटकर लगभग 36 करोड़ रह जाती है।

महिलाओं की भागीदारी औपचारिक और अनौपचारिक दोनों क्षेत्रों में पहले से ही सीमित थी, लेकिन अब इसमें कुछ बढ़ोतरी दिखाई दे रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 3 करोड़ महिलाएं वेतनभोगी वर्ग में शामिल हो चुकी हैं। इसके बावजूद कृषि और घरेलू कार्यों में लगी करोड़ों महिलाओं के श्रम का आर्थिक मूल्य अब भी औपचारिक रूप से नहीं आंका जाता।

मजदूर आंदोलन का वर्तमान उभार वस्तुतः उदारीकरण के बाद बनी वैश्विक अर्थव्यवस्था की एक कड़ी के संकटग्रस्त होने के साथ शुरू हुआ है। मोदी सरकार के आने के बाद जिस तरह से मित्र पूंजीवाद और कॉरपोरेट घरानों के पक्ष में नीतियां बनाई गईं, उससे लगा कि भारत 18वीं सदी के बर्बर पूंजीवाद के दौर की ओर वापस लौट रहा है। आर्थिक नीतियों ने मजदूर वर्ग के जीवन को ही विखंडित नहीं किया, बल्कि उनके संगठित प्रतिरोध को भी कमजोर बना दिया। मजदूरी की लूट और 12 घंटे के कार्य दिवस की अमानवीय स्थितियों के कारण व्यापक मजदूर वर्ग के भीतर प्रतिरोध की भौतिक प्रक्रियाएं सक्रिय हो चुकी थीं। बस उसे वैश्विक पूंजीवाद के संकटग्रस्त होने का इंतजार था।

ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए फारस की खाड़ी से तेल, गैस और क्रूड ऑयल की सप्लाई रोक दी, तो दुनिया हिलने लगी। साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था का संकट गहराने और उसकी श्रृंखला की एक कड़ी के कमजोर होते ही पूरा वैश्विक आर्थिक ढांचा लड़खड़ाने लगा, जिसका तीव्र असर भारत में महसूस किया गया।

भारतीय उपमहाद्वीप में इसका सबसे गहरा प्रभाव भारत पर पड़ा। इसके कारण की तलाश मोदी सरकार की अमेरिकी-इजरायलीपरस्ती में की जानी चाहिए। पुराने मित्र ईरान का साथ छोड़कर युद्ध के 48 घंटे पहले जिस तरह से मोदी ने इजरायल के समक्ष आत्मसमर्पण किया, उसने पलटवार कर दिया है। भारत के तेल टैंकरों की आवाजाही को नियंत्रित और सीमित कर ईरान ने हल्का-सा झटका दिया। पहले से चरमराई भारतीय अर्थव्यवस्था डगमगा गई है।

पहले चरण में इसका प्रभाव मजदूर आंदोलन के विस्फोट के रूप में दिखाई दिया। इसके दूरगामी प्रभाव कृषि क्षेत्र, विशेषकर यूरिया फर्टिलाइजर की किल्लत, और प्लास्टिक उद्योगों पर पड़ने वाले हैं। देश अब संघ और भाजपा की विभाजनकारी नीतियों की कीमत चुकाने लगा है।

अभी यह संकट ऊर्जा के साथ जुड़ा है। वर्तमान दुनिया ऊर्जा पर ही टिकी है। विश्व पूंजीवाद का आर्थिक पहिया पेट्रोल, डीजल और प्राकृतिक गैस की शक्ति से दौड़ता है. इसलिए ईरान जैसे देश इसकी ताकत को समझने लगे हैं और इसे युद्ध में एक घातक हथियार के तौर पर प्रयोग किया गया, जिसका जवाब अमेरिकी अजेय बमवर्षकों और मिसाइलों के पास भी नहीं था।

ईरान द्वारा होर्मुज की नाकेबंदी की रणनीति ने अमेरिकी अजेयता के मिथ पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। यही नहीं, ईरान ने तेल को अमेरिकी युद्ध गठजोड़ के सहयोगियों के खिलाफ जिस तरह एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया, वह बम, मिसाइल और ड्रोन से भी ज्यादा घातक हथियार साबित हुआ।

आज भारत को अमेरिका, वेनेजुएला जैसे देशों से डेढ़ गुना ज्यादा कीमत पर पेट्रोलियम पदार्थों का आयात करना पड़ रहा है। कारण यह है कि ईरान की नजर में भारत की विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है। एविएशन उद्योग संकट में है और कई हवाई कंपनियां अपना कारोबार समेटने लगी हैं। भारत सरकार को एलपीजी और पेट्रोलियम पदार्थों की सप्लाई की राशनिंग करनी पड़ सकती है।

युद्ध से पहले जिस क्रूड ऑयल के भारतीय बाजार तक पहुंचने में 55-56 रुपये का खर्च आता था, अब वही 120 से 125 रुपये में पहुंच रहा है। उस समय भी भारत सरकार 55 रुपये वाले तेल को 95 से 110 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से बेच रही थी, जिससे सरकार को 10 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त लाभ होता था। अब जब वही तेल 125 रुपये में पहुंच रहा है, तो 10 लाख करोड़ रुपये के घाटे की भरपाई कैसे होगी? मोदी सरकार के हाथ-पांव फूलने लगे हैं।

आने वाले समय में कृषि सीजन शुरू होगा। किसानों को खाद की किल्लत से जूझना पड़ेगा, जिससे निश्चित रूप से कृषि उत्पादकता प्रभावित होगी। संकट के समय कृषि ही वह एकमात्र क्षेत्र रहा है, जिसने रिवर्स माइग्रेशन को संभाला और वृद्धि दर को बचाए रखा। नोटबंदी और कोरोना काल में भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि के सहारे ही बची रही थी, लेकिन इस बार कृषि क्षेत्र के लिए भी ऐसा कर पाना संभव नहीं होगा।

भारत का 40 प्रतिशत पेट्रोलियम उत्पाद और रसोई गैस फारस की खाड़ी के देशों से आती रही है। इसी से फर्टिलाइजर तैयार होते थे, घरों के चूल्हे जलते थे और अन्य जरूरी वस्तुएं बनती थीं। लेकिन मोदी सरकार की अमेरिका और इजरायलपरस्ती वाली आत्मघाती नीतियों ने देश को एक नए संकट के दरवाजे पर ला खड़ा किया है।

सरकार पिछले दरवाजे से जनता पर संकट का बोझ डालने की कोशिश कर रही है। हाल ही में कमर्शियल गैस के दाम बढ़ाए गए हैं, जिसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। होटल व्यवसाय से लेकर छोटे दुकानदारों और चाय बेचने वाले कारोबारियों तक सभी पर इसका दबाव बढ़ेगा। रोटी-दाल, चाय-बिस्कुट से लेकर खाने-पीने की लगभग हर चीज महंगाई की मार झेलेगी।

इस बीच सरकार ने विश्वविद्यालयों में प्रवेश शुल्क से लेकर शिक्षा शुल्क तक में भारी वृद्धि की है। नई शिक्षा नीति के तहत विश्वविद्यालयों की 50 प्रतिशत सीटें खुले बाजार में बेचे जाने की व्यवस्था की जा रही है। मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में यह व्यवस्था पहले से लागू थी, जहां आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों के कम अंक पाने वाले बेटे-बेटियां भी डॉक्टर और इंजीनियर बन जाते थे।

इससे यह संकेत मिलता है कि नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ सरकारों के पास आर्थिक और सामाजिक संकटों के समाधान के लिए दमनात्मक उपायों के अलावा सीमित विकल्प दिखाई दे रहे हैं।

हमने माओवादियों के सफाए के लिए अमित शाह के नेतृत्व में गृह मंत्रालय द्वारा घोषित 31 मार्च 2026 की डेडलाइन देखी थी। अब दमन का दायरा और उसकी तीव्रता दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों, ट्रेड यूनियन नेताओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक फैल चुकी है।

मजदूरों पर चल रहे फासिस्ट दमन के खिलाफ जिस तरह छात्र, गांधीवादी, सामाजिक कार्यकर्ता, वकील, मानवाधिकार के क्षेत्र में काम करने वाले लोग, ट्रेड यूनियनें और 300 से ज्यादा वाम-जनवादी लेखक, पत्रकार तथा अकादमिक एकजुट हुए हैं, वह लोकतंत्र, न्याय तथा रोजी-रोटी और सम्मानजनक जीवन की लड़ाई को नई शक्ति प्रदान करेगा।

वर्तमान समय में मजदूर आंदोलन की अंतर्वस्तु बदल रही है। अब यह सिर्फ वेतन वृद्धि, निजीकरण के विरोध और वर्कलोड तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि हिंदुत्ववादी साम्राज्यवादी प्रभुत्व के समक्ष समर्पण और कॉरपोरेट फासीवाद के खिलाफ संघर्ष का मुद्दा भी बनता जा रहा है। वैश्वीकरण के दुष्प्रभावों के खिलाफ भारत के जनगण की एकजुटता एक नए तरह का संकेत दे रही है।

दुर्भाग्य यह है कि राजनीतिक पार्टियां इस खतरे को समझ नहीं रही हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सामाजिक न्याय के झंडाबरदार, जो दमनकारी राज्य में हिस्सेदारी के लिए व्याकुल हैं, राज्य के अलोकतांत्रिक और फासीवादी व्यवहार के खिलाफ अवसरवादी चुप्पी ओढ़े हुए हैं। फायरब्रांड दलित नेता हाल में अमेरिकी यात्रा पर थे। हम जानते हैं कि इस तरह की यात्राएं किन ताकतों द्वारा प्रायोजित होती हैं। लगता है कि बहुत कुछ बदल रहा है। शायद सामाजिक और राजनीतिक शक्तियों की वर्गीय गोलबंदी शुरू हो चुकी है।

अभी वाम-जनवादी नागरिक आर्थिक संकट के इस कठिन दौर में राज्य द्वारा मजदूरों, छात्रों, आदिवासियों और महिलाओं पर डाले जा रहे आर्थिक बोझ के खिलाफ संघर्ष के मोर्चे पर हैं। मोदी सरकार की नीतियों ने देश को जिस स्थिति में पहुंचा दिया है, वहां दो ही रास्ते बचे हैं -- या तो लोकतांत्रिक ताकतें एक मंच पर आकर संविधान और लोकतंत्र के अपहरण के खिलाफ संघर्ष को जीतें, या फिर फासीवाद के भारतीय संस्करण में जीने के लिए तैयार रहें।

कई सवालों के जवाब केवल इतिहास और वर्तमान में ही नहीं, बल्कि भविष्य के गर्भ में भी पल रहे होते हैं। भारत में चल रहा यह महान संक्रमण काल स्वतंत्रता आंदोलन के 1930-40 के दशक की तरह एक नए भविष्य का संकेत देता दिखाई दे रहा है। शायद इसी को इतिहास का दोहराव कहते हैं।

*(लेखक अखिल भारतीय किसान महासभा की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष है।)*
*Devashish Govind Tokekar*
*VANDE Bharat live tv news Nagpur*
Editor/Reporter/Journalist
RNI:- MPBIL/25/A1465
*Indian Council of press,Nagpur*
Journalist Cell
*All India Media Association
Nagpur*
*District President*
*Delhi Crime Press*
RNI NO : DELHIN/2005/15378
AD.Associate /Reporter
*INDIAN PRESS UNION*
District Reporter
Contact no.
9422428110/9146095536
Head office:- plot no 18/19, flat no. 201,Harmony emporise, Payal -pallavi society new Manish Nagar somalwada nagpur - 440015

8
93 views

Comment