सियासत का व्याकरण: "तुष्टीकरण" के बहुरूप और मीडिया का चश्मा ।
"विकाश अब सड़कों पर नहीं चलता, वह अब न्यूज रूम के ग्राफिक्स और एंकरों के चीख पुकार में तैरता है। जबतक जनता भावुकता के हफिम का नशा करेगी तब तक उसकी थाली में रोटी नहीं केवल भाषण परोसे जाएंगे ।
भारतीय राजनीति के शब्दकोश में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो समय के साथ केवल शब्द नहीं रह जाते, बल्कि एक राजनैतिक हथियार बन जाते हैं। विशेषकर साल 2014 के बाद, भारतीय मीडिया और विमर्श में एक शब्द सबसे ज्यादा गूंजा है "तुष्टिकरण"
सामान्य भाषा में 'तुष्टिकरण' का अर्थ बेहद सरल हैकिसी व्यक्ति, समूह या समुदाय की मांगों को अनुचित या उचित तरीके से पूरा करके उसे शांत करना या खुश रखना। लेकिन आधुनिक भारत में इस शब्द की परिभाषा को इतनी खूबसूरती और चालाकी से बदला गया है कि आज इस शब्द के आते ही आम जनता के दिमाग में केवल एक ही छवि उभरती है:
"हिंदू बनाम मुस्लिम"
सच्चाई यह है कि भाषा का यह संकुचित दायरा हमारी सोच पर एक कील की तरह ठोक दिया गया है। आइए, मीडिया के इस 'न्यूजरूम नैरेटिव' से बाहर निकलकर देखते हैं कि असल में तुष्टिकरण का खेल हमारे समाज में कितने अलग-अलग रूपों में खेला जा रहा है।
जब हम सांप्रदायिक चश्मे को उतारकर देखते हैं, तो तुष्टिकरण का सबसे बड़ा रूप जातियों के गणित में दिखाई देता है। अभी हाल ही में देश में 'UGC नियमावली' और अन्य आरक्षण जनित प्रशासनिक बदलावों को लेकर जो विवाद हुए, वह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा। यह तुष्टिकरण हिंदू बनाम मुस्लिम नहीं, बल्कि "हिंदू बनाम हिंदू" था, जहाँ "अगड़ा बनाम पिछड़ा" की लकीर खींची गई।
हमारे समाज में ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से जातियों का वर्गीकरण हुआ। लेकिन आज की राजनीति ने 'हरिजन एक्ट' (SC/ST Act) या अन्य विशेष प्रावधानों को इस तरह इस्तेमाल किया है मानो यह मान लिया गया हो कि उच्च जाति का हर व्यक्ति शोषक है और निचली जाति का हर व्यक्ति केवल पीड़ित। यहाँ भी बिना गहराई में जाए, एक बड़े वर्ग को खुश करने के लिए वोटबैंक का 'जातिगत तुष्टिकरण' धड़ल्ले से चालू है, लेकिन यहाँ यह शब्द मौन हो जाता है।
तुष्टिकरण का एक और रूप स्त्री बनाम पुरुष के कानूनी और सामाजिक संतुलन में दिखता है। आधुनिक कानूनों और सामाजिक धारणाओं में कई बार यह 'प्री-कंसेप्ट' (Pre-concept) मान लिया जाता है कि यदि कोई विवाद है, तो पुरुष ही दोषी होगा।
चाहे शादी के एक साल बाद होने वाले विवादों में दहेज उत्पीड़न (Dowry Act) का आंख मूंदकर इस्तेमाल हो या घरेलू हिंसा के कानून, कई बार इन विशेष संरक्षणों का राजनीतिक लाभ उठाने के लिए एकतरफा इस्तेमाल किया जाता है। पुरुषों के अधिकारों या उनके साथ होने वाले अन्याय पर कानून अक्सर मौन हो जाते हैं। यहाँ भी एक बड़े वोटबैंक (महिला वर्ग) को साधने के लिए 'लैंगिक तुष्टिकरण' होता है, मगर मीडिया के कैमरों को यहाँ तुष्टिकरण दिखाई नहीं देता।
यदि हम आर्थिक मोर्चे पर देखें, तो यदि कोई नियोक्ता (Employer) अपने कर्मचारियों से केवल समय पर आने और ईमानदारी से काम करने की अपेक्षा करे, तो अक्सर ट्रेड यूनियनों की एक फौज खड़ी हो जाती है। यह नैरेटिव बना दिया जाता है कि 'बड़ा आदमी छोटे आदमी पर जुल्म कर रहा है।'
इसके बाद सरकारों द्वारा ऐसे लेबर लॉ (श्रम कानून) या नीतियां ला दी जाती हैं जो उद्योगों की रीढ़ तोड़ देती हैं। यह मान लेना कि हर उद्योगपति या नियोक्ता केवल शोषण करने के लिए बैठा है, 'आर्थिक तुष्टिकरण' का सबसे बड़ा उदाहरण है।
भारतीय मीडिया ने 'तुष्टिकरण और हिंदुत्व' के इस कॉकटेल का इतनी सफलता से प्रयोग किया कि जनता सम्मोहित हो गई। इस महा-प्रयोग का नतीजा यह हुआ कि देश का 'वास्तविक विकास' केवल अखबारों के विज्ञापनों और मीडिया के चकाचौंध भरे न्यूजरूम तक ही सीमित रह गया। वह विकास कभी जमीन पर उतरकर आम आदमी की थाली, शिक्षा या स्वास्थ्य तक नहीं पहुँच पाया।
भारत की भोली-भाली जनता युद्ध के मैदान में खड़े उन सैनिकों की तरह अडिग रही, जो अपने सेनापति (नेताओं) के एक इशारे पर मरने-मारने और अपनी ही जेब कटवाने को तैयार बैठे हैं। जनता भावुकता के ज्वार में बहती रही और विकास केवल चर्चाओं में रहा।
अब देश के कुछ बुद्धिजीवियों और विश्लेषकों ने इस मायाजाल का अध्ययन करना शुरू किया है। सवाल सीधा है: "तुष्टिकरण और ध्रुवीकरण" के इस 15 साल के खेल से वास्तव में सबसे ज्यादा फायदा किसका हुआ?
क्या उस आम जनता का फायदा हुआ जो आज भी महँगाई, बेरोजगारी और पेपर लीक जैसी समस्याओं से जूझ रही है?
या फिर उन राजनेताओं का, जिनकी कुर्सियाँ इस नफरत और तुष्टिकरण की खाद से और ज्यादा मजबूत हो गईं?
यह सवाल आज हर नागरिक को खुद से पूछना होगा। अपने राजनैतिक चश्मे को उतारिए और पिछले 15 वर्षों में अपने आस-पास, अपने समाज और अपने परिवार के जीवन स्तर में हुए वास्तविक बदलावों का गहन अध्ययन कीजिए।
भारतीय राजनीति में यदि आपको शीर्ष पर बने रहना है, तो रंग बदलने की कला और नैरेटिव गढ़ने का हुनर आना अनिवार्य माना जाता है। लेकिन जनता को अब समझना होगा कि 'तुष्टिकरण' केवल टोपी पहनने या टीका लगाने तक सीमित नहीं है। हर वह नीति जो योग्यता को दरकिनार कर, बिना सोचे-समझे किसी वर्ग को केवल उसका वोट पाने के लिए उपकृत करती है, वह तुष्टिकरण है।
अब समय आ गया है कि भारत की जनता सैनिकों की तरह आँख बंद करके (कमांडर) के पीछे भागना बंद करे, और एक जागरूक नागरिक बनकर अपनी मेधा, अपने रोजगार और अपने बच्चों के वास्तविक भविष्य के लिए सवाल पूछना शुरू करे।
सोचिएगा जरूर!
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT