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बुढ़ापा इंसान की नहीं, समाज की असली परीक्षा

आज का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह नहीं कि इंसान बूढ़ा हो जाता है, बल्कि यह है कि समाज बूढ़े इंसान को बेकार समझने लगता है।
जब तक व्यक्ति जवान रहता है, कमाता है, दौड़ता है, सबके काम आता है तब तक वह सबका प्रिय होता है।
भाई, बहन, रिश्तेदार, मित्र, सहकर्मी सभी उसके आसपास दिखाई देते हैं।
क्योंकि तब उसके पास शक्ति होती है, संपर्क होते हैं, पैसे होते हैं, और दूसरों की समस्याएँ हल करने की क्षमता होती है।

लेकिन जैसे ही वही व्यक्ति सेवानिवृत्त होता है, शरीर थकने लगता है, आय सीमित हो जाती है समाज का व्यवहार अचानक बदल जाता है।
फोन आना बंद हो जाते हैं।
लोग मिलने से कतराने लगते हैं।
बात करने में भी लोगों को डर लगने लगता है कि कहीं सहायता न मांग ले।

यह कैसी विडंबना है?
जिस व्यक्ति ने जीवनभर दूसरों के लिए दरवाज़े खोले, वही अंत में अकेलेपन के अंधेरे में छोड़ दिया जाता है।

यही कारण है कि पुराने गीत आज भी दिल को चीर देते हैं

> सुख के सब साथी, दुख में न कोई

और सच यही है

> इस भरी दुनिया में कोई भी हमारा न हुआ,
गैर तो गैर हैं, अपनों का सहारा न हुआ

समाज को समझना होगा कि बुढ़ापा कोई अपराध नहीं, बल्कि हर जीवित इंसान का भविष्य है।
जो आज अपने बुजुर्गों की उपेक्षा कर रहा है, कल वही समय उसके दरवाज़े पर भी दस्तक देगा।
कर्म का चक्र बहुत शांत होता है, लेकिन बहुत सटीक होता है।
आज जो अपने माता-पिता, बड़े भाई, बहन, रिश्तेदार या पुराने मित्रों को अकेला छोड़ रहे हैं, कल वही अकेलापन उनके हिस्से में भी आएगा।

दुनिया का सबसे बड़ा धन पैसा नहीं, बल्कि अपनापन और सम्मान है।
बुजुर्गों को दया नहीं, सम्मान चाहिए।
दो मीठे शब्द चाहिए।
थोड़ा समय चाहिए।
यह मत भूलिए कि जिन हाथों को आज आप कमजोर समझ रहे हैं, उन्हीं हाथों ने कभी आपका भविष्य बनाया था।

आज समाज आधुनिक तो हो गया, लेकिन संवेदनहीन भी होता जा रहा है।
मोबाइल में हजारों संपर्क हैं, लेकिन हाल पूछने वाला कोई नहीं।
सोशल मीडिया पर हजारों मित्र हैं, लेकिन दुख बांटने वाला कोई नहीं।

इंसान की असली पहचान यह नहीं कि वह कितनी बड़ी गाड़ी चलाता है, बल्कि यह है कि वह अपने बुजुर्गों और पुराने संबंधों के साथ कैसा व्यवहार करता है।

इसलिए अभी भी समय है
अपने बुजुर्गों को बोझ नहीं, अनुभव का खजाना समझिए।
उनसे बात कीजिए।
उनका सम्मान कीजिए।
क्योंकि जीवन का अंतिम सत्य यही है कि हर जवान इंसान को एक दिन बूढ़ा होना है।

और अंत में रफी साहब का यह गीत जीवन का कड़वा सत्य बनकर सामने खड़ा हो जाता है

> मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं,
यूं जा रहे हैं जैसे हमें जानते नहीं

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डॉ. एम. एस. बाली
स्वतंत्र पत्रकार, देश चिंतक

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