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कविता : कृष्णसुदामा की अमर मित्रता

धरती पर जब प्रेम उतरता,
मित्रता का रूप वो धरता,
स्वार्थ जहाँ सब भूल जाएँ,
दिल से दिल के दीप जलाएँ।

ऐसी ही इक कथा पुरानी,
मीठी जैसे गंगा का पानी,
कृष्ण-सुदामा की वो यारी,
दुनिया में सबसे थी प्यारी।

एक तरफ थे द्वारिकाधीश,
जिनके आगे झुकते थे शीश,
सोने-चाँदी के थे महल,
वैभव जिनका था अविरल।

दूजी ओर सुदामा निर्धन,
फटे वस्त्र, सूखा था जीवन,
छोटा सा इक टूटा घर था,
लेकिन मन में प्रेम अमर था।

संदीपन के आश्रम में दोनों,
पढ़ते थे संग होकर मौन,
एक थाली, एक कहानी,
सुख-दुख की थी साझेदारी।

जंगल से जब लकड़ी लाते,
हँसते-गाते घर को आते,
बारिश में भी भीगते दोनों,
फिर भी खुश रहते थे दोनों।

कभी सुदामा भूखे रहते,
कृष्ण उन्हें अपना फल देते,
कभी कृष्ण मुस्काते प्यारे,
सुदामा बन जाते सहारे।

मित्रता का था ऐसा नाता,
जिसमें न ऊँच-नीच का खाता,
ना राजा का अभिमान था,
ना निर्धनता अपमान था।

समय बीता, दिन बदल गए,
अपने-अपने पथ पर चल गए,
कृष्ण बने द्वारिका के राजा,
भाग्य ने पहना दिया ताज।

पर सुदामा की हालत कठिन,
रहता घर में केवल शोक-वेदन,
बच्चों के चेहरे सूखे रहते,
आँसू चुपके-चुपके बहते।

एक दिन पत्नी ने समझाया,
कृष्ण से जाकर मिल आओ ना,
मित्र तुम्हारा जग का स्वामी,
दूर करेंगे दुख तमाम ही।

सुदामा बोले बड़ी लजाकर,
कैसे जाऊँ हाथ पसारकर,
मित्रता को व्यापार न बनाऊँ,
कैसे अपने दर्द सुनाऊँ।

पत्नी बोली जाओ प्यारे,
मित्र कभी ना होते पराये,
प्रेम जहाँ सच्चा होता है,
वहाँ न कोई छोटा होता है।

थोड़े से चिवड़े बाँध दिए,
कपड़े में कुछ दाने रख दिए,
बस इतना ही था उपहारा,
लेकिन उसमें प्रेम था सारा।

चल पड़े फिर पथ पर धीरे,
नंगे पाँव, थके से शरीर,
मन में यादें आश्रम वाली,
आँखों में थी छवि निराली।

द्वारिका जब सामने आई,
सोने जैसी चमक दिखाई,
महलों की ऊँची दीवारें,
देख सुदामा हुए बेचारे।

द्वारपाल ने नाम जो जाना,
कृष्ण का बचपन का यार पुराना,
दौड़ पड़ा संदेश सुनाने,
मित्र सुदामा द्वार पे आने।

सुनते ही भगवान मुरारी,
छोड़ सभा दौड़े गिरधारी,
नंगे पाँव चले वे ऐसे,
बरसों बाद मिले हों जैसे।

गले लगाया प्रेम से उनको,
भर लिया अपने ही मन को,
आँखों से आँसू बह निकले,
स्नेह के सारे बंधन पिघले।

राजा होकर चरण पखारे,
देख देवता भी थे हारे,
रुक्मिणी भी विस्मित होकर,
देख रही थी दृश्य सँवरकर।

कृष्ण ने पूछा मित्र बताओ,
क्या लाए हो मेरे लिए आओ?
सुदामा मन ही मन शरमाए,
छिपे चिवड़े बाहर न लाए।

पर कृष्ण कहाँ रुकने वाले,
प्रेम के मोती पहचानने वाले,
छीन पोटली हँसकर बोले,
इनसे बढ़कर रत्न न भोले।

एक मुट्ठी जब मुख में डाली,
भर गई जैसे दुनिया खाली,
दूजी मुट्ठी लेने आए,
रुक्मिणी मुस्काकर रुकवाए।

क्योंकि एक मुट्ठी में ही सारा,
दुख-दरिद्र हो गया किनारा,
मित्र प्रेम का मान बढ़ाया,
कृष्ण ने जग को ये समझाया।

सुदामा कुछ भी माँग न पाए,
मित्र मिलन में ही सुख पाए,
खाली हाथ वो घर को लौटे,
लेकिन मन के दीप थे जलते।

घर पहुँचे तो दृश्य निराला,
टूटा झोपड़ महल में बदला,
बच्चों के मुख फूल से खिलते,
आँगन में सुख दीपक जलते।

पत्नी आई हँसती-गाती,
आँखों में थी खुशी समाती,
सुदामा तब समझ ये पाए,
मित्र हृदय सब जान ही जाए।

कृष्ण-सुदामा की ये गाथा,
सदियों से देती है व्याख्या,
सच्चा मित्र वही कहलाता,
जो हर हालत साथ निभाता।

ना धन-दौलत बीच में आए,
ना ऊँचे पद रिश्ते खाएँ,
मित्रता का अर्थ यही है,
दिल से दिल का सेतु वही है।

जब दुनिया सब साथ छोड़ दे,
अँधियारा हर ओर जोड़ दे,
तब जो हाथ थाम ले चुपके,
वही मित्र है जीवन रूप के।

कृष्ण-सुदामा की अमर कहानी,
आज भी लगती उतनी सुहानी,
प्रेम जहाँ निष्कलुष रहता,
वहाँ स्वयं भगवान बसता।

मित्रता का दीप जलाओ,
मन में प्रेम सदा बसाओ,
कृष्ण-सुदामा जैसी यारी,
बन जाए दुनिया की फुलवारी।

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