*नए मंत्रियों के विभागों के बंटवारे में देरी: उत्तर प्रदेश भाजपा में शक्ति संतुलन की नई जंग।*
*दिल्ली बनाम लखनऊ की चर्चाओं के बीच बढ़ी सियासी हलचल।*
*नए मंत्रियों के विभागों के बंटवारे में देरी: उत्तर प्रदेश भाजपा में शक्ति संतुलन की नई जंग।*
*दिल्ली बनाम लखनऊ की चर्चाओं के बीच बढ़ी सियासी हलचल।*
*लेखक: चंद्रहास, पत्रकार, दिल्ली।*
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद अब सबसे ज्यादा चर्चा विभागों के बंटवारे को लेकर हो रही है। छह नए मंत्रियों को शपथ दिला दी गई, उन्हें सरकारी दफ्तर भी आवंटित कर दिए गए, लेकिन अब तक विभागों की घोषणा नहीं हो सकी है। राजनीतिक गलियारों में इसे केवल प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन और केंद्रीय नेतृत्व बनाम राज्य नेतृत्व की खींचतान के रूप में देखा जा रहा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार में हाल ही में छह नए चेहरों को शामिल किया गया। इनमें जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की स्पष्ट कोशिश दिखाई दी। भाजपा ने ओबीसी, दलित, ब्राह्मण और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए मंत्रिमंडल का विस्तार किया। लेकिन शपथ ग्रहण के कई दिन बाद भी विभागों की घोषणा न होना इस विस्तार को और अधिक राजनीतिक बना रहा है।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार गृह, लोक निर्माण विभाग, सूचना, ऊर्जा और कुछ बड़े बजट वाले विभागों को लेकर सहमति बनने में देरी हो रही है। भाजपा के भीतर यह माना जाता है कि उत्तर प्रदेश में गृह और पीडब्ल्यूडी जैसे विभाग केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति के केंद्र माने जाते हैं। ऐसे विभागों के जरिए सरकार की राजनीतिक छवि और संगठनात्मक पकड़ दोनों मजबूत होती हैं। यही कारण है कि विभागों का बंटवारा बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।
भाजपा के भीतर इस समय सबसे बड़ा सवाल यह है कि अंतिम फैसला मुख्यमंत्री की इच्छा से होगा या केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति के अनुसार होगा। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चाहते हैं कि अहम विभाग उन्हीं नेताओं को दिए जाएं जिन पर उन्हें प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से पूरा भरोसा है। वहीं केंद्रीय नेतृत्व चाहता है कि संगठन और सरकार के बीच संतुलन बना रहे तथा 2027 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर मंत्रालयों का वितरण किया जाए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। भाजपा की राजनीतिक कार्यशैली में बड़े राज्यों के अहम फैसलों में केंद्रीय नेतृत्व की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। उत्तर प्रदेश देश की सबसे बड़ी राजनीतिक प्रयोगशाला माना जाता है और 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए 2029 लोकसभा चुनाव की तैयारी का आधार बनेगा। ऐसे में केंद्र की दिलचस्पी स्वाभाविक मानी जा रही है।
सूत्र बताते हैं कि दिल्ली स्तर पर कई दौर की चर्चा हो चुकी है। केंद्रीय नेतृत्व चाहता है कि मंत्रिमंडल का हर फैसला सामाजिक समीकरण और राजनीतिक संदेश दोनों को ध्यान में रखकर लिया जाए। भाजपा यह नहीं चाहती कि किसी बड़े सामाजिक समूह या क्षेत्र में यह संदेश जाए कि उसे अपेक्षित महत्व नहीं मिला।
भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन सिन्हा की भूमिका भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। संगठन स्तर पर यह देखा जा रहा है कि सरकार और पार्टी के बीच तालमेल बना रहे। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व चाहता है कि संगठन से जुड़े नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं को भी उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संदेश मिले। इसी बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक बहस जारी है। संघ प्रत्यक्ष रूप से सरकार के फैसलों में हस्तक्षेप नहीं करता, लेकिन भाजपा की वैचारिक और संगठनात्मक दिशा तय करने में उसकी राय को हमेशा महत्व दिया जाता है। माना जा रहा है कि संघ चाहता है कि सरकार में ऐसे चेहरों को प्रमुखता मिले जिनकी संगठनात्मक स्वीकार्यता मजबूत हो और जो जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच प्रभाव रखते हों।
विपक्ष ने इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा के भीतर दो शक्ति केंद्रों की लड़ाई करार देना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने तंज कसते हुए कहा कि मंत्री बन गए हैं, लेकिन विभाग दिल्ली से पास होकर आएंगे। कांग्रेस नेताओं ने भी दावा किया कि उत्तर प्रदेश सरकार के भीतर निर्णय लेने की स्वतंत्रता सीमित हो गई है। विपक्ष लगातार यह सवाल उठा रहा है कि यदि मुख्यमंत्री को पूरी स्वतंत्रता है तो विभागों के बंटवारे में इतनी देरी क्यों हो रही है।
वहीं भाजपा इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि विभागों का वितरण एक सामान्य प्रक्रिया है और इसमें प्रशासनिक व राजनीतिक स्तर पर विस्तृत विचार-विमर्श किया जाता है। भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि सरकार और संगठन के बीच पूरी एकजुटता है तथा सभी फैसले सामूहिक सहमति से लिए जा रहे हैं।
बावजूद इसके, राजनीतिक संकेत कुछ और कहानी भी बताते हैं। उत्तर प्रदेश भाजपा में अब शक्ति संतुलन का नया दौर दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राज्य की राजनीति में बेहद मजबूत और लोकप्रिय नेता माने जाते हैं, वहीं केंद्रीय नेतृत्व भी उत्तर प्रदेश को लेकर किसी तरह का राजनीतिक जोखिम नहीं लेना चाहता। ऐसे में विभागों का बंटवारा केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भाजपा की भविष्य की राजनीतिक दिशा का संकेत बन गया है।
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि आखिरकार किसे कौन सा विभाग मिलता है। क्योंकि विभागों की सूची ही यह तय करेगी कि उत्तर प्रदेश सरकार में राजनीतिक शक्ति का वास्तविक केंद्र कहां है और सत्ता के संचालन में अब दखल लखनऊ या दिल्ली की है।
*Devashish Govind Tokekar*
*VANDE Bharat live tv news Nagpur*
Editor/Reporter/Journalist
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Journalist Cell
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