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ग़ैर-ज़रूरी रस्मों को छोड़कर सुन्नत-ए-नबवी को अपनाना वक़्त की अहम ज़रूरत

ग़ैर-ज़रूरी रस्मों को छोड़कर सुन्नत-ए-नबवी को अपनाना वक़्त की अहम ज़रूरत, शेन्दुर्णी में मदरसा फैज़ान-ए-गुलशन-ए-रज़ा का सालाना सनद तक़सीम व दस्तारबंदी प्रोग्राम शानदार अंदाज़ में मुनअक़िद

जलगांव: (एजाज़ गुलाब शाह)
जलगांव ज़िले के जामनेर तहसील से मुत्तसिल मशहूर तिजारती कस्बा शेन्दुर्णी बार फिर दीनियत और रूहानियत की फ़िज़ाओं से महक उठा, जब यहां के मक़बूल सुन्नी अरबी इदारे मदरसा फैज़ान-ए-गुलशन-ए-रज़ा के ज़ेरे-एहतिमाम सालाना सनद तक़सीम व दस्तारबंदी तक़रीब बड़े ही शानदार और पुरवक़ार माहौल में मुनअक़िद की गई इस मुबारक मौक़े पर अतराफ़ व अकनाफ़ से बड़ी तादाद में लोगों ने देर रात तक शिरकत कर दीनी तालीम और मोहब्बत-ए-रसूल के साथ अपनी वालिहाना अकीदत का इज़हार किया तक़रीब में 65 तलबा-ओ-तालिबात को नाज़िरा-ए-कुरआन, हम्द-ओ-नात और मुख़्तलिफ़ मुकाबलों में इम्तियाज़ी कामयाबी हासिल करने पर सनद, इनआमात और ट्रॉफियां पेश की गईं वहीं कई खुशनसीब तलबा की दस्तारबंदी हज़रत मौलाना शाकिर रज़ा साहब (नासिक), मौलाना रफ़ाक़त हुसैन रज़ा, मौलाना नूर मोहम्मद क़ादरी, हाफ़िज़ सलमान रज़ा फरीदपुरी, मौलाना अब्दुल ग़फ़्फ़ार रज़ा, हाफ़िज़ इमरान शाहपुरी समेत दीगर उलेमा-ए-किराम और हाफ़िज़-ए-कुरआन के मुबारक हाथों से अमल में आई। इस दौरान पूरा माहौल बेहद रूहपरवर और जज़्बाती नज़र आया तथा मुश्तमिलीन की आंखों में खुशी और अकीदत साफ़ झलक रही थी अपने पुरअसर और दिलनशीं अंदाज़-ए-ख़िताब के लिए मशहूर हज़रत मौलाना शाकिर रज़ा साहब, खतीब जामा मस्जिद नासिक ने मौजूदा समाजी हालात पर निहायत फ़िक्रअंगेज़ और इस्लाह-मआब बयान पेश किया। उन्होंने ख़ुसूसन शादी-ब्याह में रिवाज पा चुकी फ़िज़ूल और ग़ैर-ज़रूरी रस्मों पर तन्क़ीद करते हुए फरमाया:
आज मुस्लिम मुआशरा सुन्नत-ए-रसूल से दूरी की वजह से बेशुमार समाजी और घरेलू मसाइल का शिकार हो रहा है अगर निकाह को इस्लामी तालीमात और सादगी के मुताबिक़ आम किया जाए, तो बहुत सी बुराइयां ख़ुद-ब-ख़ुद ख़त्म हो सकती हैं मौलाना ने नौजवान नस्ल को सुन्नत-ए-नबवी को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाने, अख़लाक़-ए-मुस्तफ़वी अपनाने और दीन-ए-इस्लाम की हक़ीक़ी तालीमात पर अमल करने की तरगीब दी उन्होंने कहा कि कामयाब ज़िंदगी का अस्ल राज इश्क़-ए-रसूल और इताअत-ए-सुन्नत में पोशीदा है
क़ाबिल-ए-ज़िक्र है कि यह दीनी और इस्लाही ख़िदमत अंजाम देने वाला इदारा इलाके के मशहूर समाजी व कौमी रहनुमा काज़ी नजमुद्दीन साहब की सरपरस्ती में कामयाबी के साथ अपनी ख़िदमात अंजाम दे रहा है। उनके रुफ़क़ा कलीम मोमिन, अबर नवाज़ खान, सलीम भाई अल्लाह बख्श और सैयद वसीम दीनी और तालीमी सरगर्मियों को फ़रोग़ देने में बराबर मुतहर्रिक हैं, जबकि मदरसे के उस्ताद हज़रत मौलाना इरफान साहब की ख़ुसूसी कोशिशें इदारे की तरक़्क़ी में अहम किरदार अदा कर रही है तक़रीब का इख़्तिताम दरूद-ओ-सलाम की निहायत पुरकैफ़ और रूहानी महफ़िल पर हुआ, जहां आशिक़ान-ए-रसूल ने नम आंखों और पुरअकीदत माहौल में बारगाह-ए-रसालत में अपना ख़िराज-ए-अकीदत पेश किया पूरा माहौल ज़िक्र-ए-मुस्तफ़ा की ख़ुश्बुओं से महक उठा और लोग अपने दिलों में ईमान, मोहब्बत-ए-रसूल और दीनी जज़्बे की नई रोशनी लेकर लौटे

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