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क्या नफ़रत बाँटना ही सियासत बन गई है? भारत की मिट्टी मोहब्बत, गंगा-जमुनी तहज़ीब और सबका साथ की पहचान रही है।

क्या नफ़रत बाँटना ही सियासत बन गई है?
भारत की मिट्टी मोहब्बत, गंगा-जमुनी तहज़ीब और सबका साथ की पहचान रही है। यहाँ सदियों से अलग-अलग धर्म, जाति और संस्कृतियाँ साथ रहती आई हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में समाज के भीतर एक दूरी, एक अविश्वास और नफ़रत का माहौल महसूस किया जाने लगा है।
एक तरफ़ विदेशों में, खासकर मिडिल ईस्ट और ईरान जैसे मुस्लिम देशों के साथ दोस्ती, व्यापार और भाईचारे की बातें होती हैं, वहीं दूसरी तरफ़ अपने ही देश के मुसलमानों को शक की नज़रों से देखना, हर मुद्दे में उन्हें निशाना बनाना और सोशल मीडिया से लेकर चुनावी मंचों तक धर्म के नाम पर माहौल बनाना ये सवाल खड़े करता है कि आखिर ऐसा क्यों?
क्या सच में धर्म खतरे में है?
या फिर लोगों को धर्म और जाति के नाम पर बाँटना राजनीति का सबसे आसान तरीका बन चुका है?
2014 के बाद देश में राजनीति का स्वर बदला है। विकास और रोज़गार जैसे मुद्दों से ज़्यादा धर्म, पहचान और भावनाओं की राजनीति चर्चा में रही। सोशल मीडिया ने भी इस आग में घी डालने का काम किया, जहाँ झूठ, आधी-अधूरी खबरें और नफ़रत फैलाने वाले संदेशों ने समाज को बाँटने की कोशिश की।
लेकिन सच यह भी है कि भारत का आम इंसान आज भी मोहब्बत चाहता है, अमन चाहता है।
नफ़रत कभी किसी देश को मज़बूत नहीं बनाती।
जब समाज बँटता है, तो सबसे ज़्यादा नुकसान देश की एकता, युवाओं के भविष्य और इंसानियत का होता है।
हमें यह समझना होगा कि किसी भी धर्म के कुछ लोगों की गलती पूरे समुदाय की पहचान नहीं हो सकती।
भारत उतना ही हिंदुओं का है, जितना मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों और हर नागरिक का।
सियासत अगर लोगों को जोड़ने के बजाय तोड़ने लगे, तो सवाल पूछना ज़रूरी हो जाता है।
क्योंकि देश नफ़रत से नहीं, आपसी सम्मान और भाईचारे से आगे बढ़ता है।

Imtiyaj khan
social media activist

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