*बातों और प्रचार में उलझी सरकार, जनता हुई लाचार और बेबस*
न्यूज़ रिपोर्टर मोहित संघी
*बातों और प्रचार में उलझी सरकार, जनता हुई लाचार और बेबस*
देश की जनता आज जिस दौर से गुजर रही है, उसमें सबसे ज्यादा अगर कोई परेशान है तो वह आम नागरिक है। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अपराध और रोजमर्रा की बढ़ती परेशानियों ने आम आदमी का जीवन कठिन बना दिया है। हर संकट और हर आपदा के समय जनता उम्मीद करती है कि सरकार राहत देगी, समाधान निकालेगी और मजबूती से लोगों के साथ खड़ी दिखाई देगी। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज समस्याओं के समाधान से ज्यादा जोर प्रचार और छवि चमकाने पर दिखाई देता है।
जब भी कोई आपदा आती है चाहे आर्थिक संकट हो, महंगाई हो, बेरोजगारी हो या किसी क्षेत्र में प्राकृतिक समस्या तब सरकार के प्रतिनिधि बड़े-बड़े भाषण और भावनात्मक संदेश देने लगते हैं। सोशल मीडिया पर अभियान चलाए जाते हैं, रीलें बनाई जाती हैं और जनता को त्याग, धैर्य और राष्ट्रहित का पाठ पढ़ाया जाता है। लेकिन जमीन पर आम आदमी की परेशानियां कम होती नजर नहीं आतीं।
आज स्थिति यह है कि गरीब और मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा दबाव में है। नौकरी की चिंता अलग, महंगाई का बोझ अलग और सरकारी दफ्तरों में परेशानियां अलग। आम नागरिक हर जगह संघर्ष कर रहा है। कहीं बिना पैसे काम नहीं होता, कहीं शिकायतें सुनने वाला नहीं है। जनता की समस्याएं फाइलों में दबकर रह जाती हैं और नेताओं की बयानबाजी टीवी चैनलों और सोशल मीडिया तक सीमित रह जाती है।
सबसे दुखद बात यह है कि हर कठिन परिस्थिति में जनता से ही त्याग की उम्मीद की जाती है। कभी तेल बचाने की सलाह, कभी खर्च कम करने का संदेश, तो कभी सादगी अपनाने की अपील। लेकिन सत्ता और प्रभावशाली लोगों की सुविधाओं में कोई कमी दिखाई नहीं देती। बड़े काफिले, महंगे कार्यक्रम, चुनावी रैलियां और प्रचार अभियान लगातार चलते रहते हैं। कई नेता कैमरे के सामने कुछ मिनट साइकिल चलाकर या ई-रिक्शा में बैठकर वाहवाही लूटते नजर आते हैं, जबकि उनके पीछे खाली गाड़ियों के काफिले चलते रहते हैं। क्या उन खाली गाड़ियों में फिजूल पेट्रोल खर्च नहीं होता?
विडंबना यह भी है कि एक तरफ आम जनता को बचत और त्याग का संदेश दिया जाता है, वहीं दूसरी ओर कई रसूखदार परिवारों के बच्चे महंगी गाड़ियों में शहरभर में घूमते दिखाई देते हैं। कोचिंग सेंटरों और कैफे के बाहर लग्जरी वाहनों की कतारें इस दोहरी मानसिकता को साफ उजागर करती हैं। मध्यम वर्ग जहां हर दिन खर्चों का हिसाब लगाने को मजबूर है, वहीं प्रभावशाली वर्ग खुलेआम दिखावे और फिजूलखर्ची में लगा हुआ है।
देश की जनता अब समझने लगी है कि केवल भाषणों और प्रचार से हालात नहीं बदलते। लोगों को राहत चाहिए, रोजगार चाहिए, ईमानदार व्यवस्था चाहिए और ऐसा शासन चाहिए जो जनता की पीड़ा को समझे। सरकार का असली काम समस्याओं का समाधान करना है, न कि हर मुद्दे को प्रचार और भावनात्मक नारों में बदल देना।
आज आम नागरिक खुद को लाचार और बेबस महसूस कर रहा है। उसे भरोसा चाहिए, सहारा चाहिए और ऐसी नीतियां चाहिए जो वास्तव में उसके जीवन को आसान बना सकें। क्योंकि लोकतंत्र केवल सत्ता चलाने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की सेवा और विश्वास का नाम होता है।