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अंग्रेजी रंगमंच को बंगला रंगमंच ने राष्ट्रीय आंदोलन का हथियार बनाया- हेमेन्द्र कुमार लाभ

अंग्रेजी रंगमंच को बंगला रंगमंच ने राष्ट्रीय आंदोलन का हथियार बनाया- हेमेन्द्र कुमार लाभ

विश्वविद्यालय संगीत एवं नाट्य विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा में दो दिवसीय विशिष्ट व्याख्यान के आयोजन के दूसरे दिन संगीत एवं नाट्य विभाग के द्वितीय व चतुर्थ सेमेस्टर के छात्रों के बीच अतिथि प्राध्यापक वरिष्ठ रंगकर्मी हेमेन्द्र कुमार लाभ ने बंगाल रंगमंच के बारे में विस्तार से छात्रों को बताया। उन्होंने बताया कि सन 1757 ईस्वी में पलासी युद्ध के बाद बंगाल की लोक नाट्य शैली 'जात्रा' से बंगाली रंगमंच की शुरुआत हुई। उस वक्त बंगला अंग्रेजों की राजधानी थी और उन्होंने अपने मनोरंजन के उद्देश्य से बंगाल में रंगमंच की शुरुआत की। उसी वक्त एक रसियन कलाकार होरासिव लेवडेफ जो कि पेशे से बैंड मास्टर था, ने रोजगार के लिए भारत आया था। उसने अंग्रेजी रंगमंच में काम शुरू किया और बाद में जब भारतीयों को इस रंगमंच से अलग रखा गया तो आहत होकर उन्होंने बंगाली रंगमंच के कलाकारों से मिलकर बंगाली रंगमंच की शुरुआत की। उन्होंने भोलानाथ दास जैसे रंगकर्मियों के सहयोग से न्यू प्ले हाउस के नाम से शुरू हुआ जो बाद में कलकत्ता थिएटर कहलाया। भोलादास ने सन 1795 ईस्वी मेंअंग्रेजी नाटक का बंगला में नाट्य रूपांतरण किया, जिसका नाम भेष था। इसके बाद इनके थिएटर ने भारतीय बंगला कलाकारों के साथ मिलकर कई सफल नाटकों का मंचन किया। ये बात अंग्रेजों को चुभने लगी और इनके थिएटर को सरकार ने साजिश कर बंद करवा दिया।
इसके बाद लेवडेफ अपने देश वापस लौट गए। पुनः बंगला रंगमंच की शुरुआत का श्रेय गिरीश चन्द्र घोष को जाता है, जिनको बंगला रंगमंच का जन्मदाता भी कहा जाता है। गिरीश चन्द्र बोस एक नाटककार और निर्देशक थे। इन्होंने संस्कृत से बंगला में अनुवाद भी किया था। दीनबंधु मित्र का लिखित नाटक नील दर्पण था। मिस्टर वुड की भूमिका ये खुद करते थे। एक दर्शक ने इन्हें अंग्रेज के अभिनय पर दर्शकों से जूते भी मारे थे। नील दर्पण के बाद इसका व्यापक प्रभाव समाज पर पड़ा और इसे रोकने के लिए अंग्रेज़ ने ड्रामेटिक परफॉर्मेंस एक्ट 1876 बनाया और नील दर्पण के कलाकारों को गिरफ्तार किया गया। उसके बाद से आज तक ये एक्ट लागू है, जिसके तहत सरकार आपको नाटक करने से रोक सकती और या गिरफ्तार भी कर सकती है।
बाद में गिरीश चन्द्र घोष ने सिराजुद्लाह जैसे नाटकों के जरिए राष्ट्रीय भावना जगाने का दूसरा माध्यम अपनाया। उसके बाद रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अपने नाटक डाकघर, दशकुमारचरित, रक्तकारवी, चित्रांगदा, श्यामा, ऋतु रंग, पहला राजा, वसंत, फाल्गुनी, चांडालिका, राजा रानी, विसर्जन आदि से बंगला रंगमंच को ऊंचाई प्रदान की। माइकल मधुसूदन दत्त जो कि ब्राह्मण बंगला परिवार से बाद में ईसाई हो गए ने शर्मिष्ठा, पद्मावती, कृष्ण मुरारी आदि नाटक लिखें। वे अंग्रेजी, ग्रीक, संस्कृत, बंगला साहित्य के विद्वान रंगकर्मी थे। शिशिर कुमार भादुड़ी जैसे कलाकार ने आलमगीर और चाणक्य की भूमिका से अभिनय को लोकप्रिय बनाया। शंभू मित्र, उत्पल दत्त ने भी इसे मुकाम तक पहुंचाया।
इस अवसर पर विशेषज्ञ एवं विभागीय छात्र-छात्राओं के अतिरिक्त विभागाध्यक्ष सह संकायाध्यक्ष प्रो लावण्य कीर्ति सिंह 'काव्या', प्रो पुष्पम नारायण, डॉ पुष्कर कुमार झा, डॉ अभिषेक स्मिथ उपस्थित थे।

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