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सिंगरौली की सड़कों ने आज वह ऐतिहासिक मंजर देखा, जिसे देखकर गणित और तर्क दोनों फेल हो गए। हमारे सिंगरौली विकास प्राधिकरण के नवनियुक्त अध्यक्ष वीरेंद्र

सिंगरौली की सड़कों ने आज वह ऐतिहासिक मंजर देखा, जिसे देखकर गणित और तर्क दोनों फेल हो गए। हमारे सिंगरौली विकास प्राधिकरण के नवनियुक्त अध्यक्ष वीरेंद्र गोयल जी ने 'सादगी' की ऐसी मिसाल पेश की कि प्रधानमंत्री जी की वीआईपी कल्चर खत्म करने की अपील भी कहीं कोने में बैठकर मुस्कुरा रही होगी।

अध्यक्ष जी मोरवा से बैढ़न के लिए ई-रिक्शा पर सवार हुए। मकसद शायद यह रहा होगा कि दुनिया देखे"देखो, पद मिलने के बाद भी ज़मीन से जुड़ा हुआ हूँ।" लेकिन पीछे-पीछे जो 200 गाड़ियों का काफिला चल रहा था, उसने सादगी के उस गुब्बारे में ऐसी सुई चुभाई कि हवा सीधे माजन मोड़ पर जाकर रुकी!

इसे कहते हैं 'भौकाल' का बैलेंस! आगे-आगे बैटरी वाला रिक्शा (जीरो प्रदूषण), और पीछे-पीछे 200 एसयूवी का धुआं (फुल भौकाल)। अध्यक्ष जी का कहना है कि कार्यकर्ता इतने 'उत्साहित' थे कि उन्हें रोकना नामुमकिन था।

"साहब, इसे ही तो असली लोकप्रियता कहते हैं! नेताजी रिक्शा पर हों और पीछे गाड़ियों का मेला न लगे, तो फिर पद का क्या फायदा?"

सोचने वाली बात ये है कि जब साहब खुद ई-रिक्शा पर थे, तो समर्थक भी तो ई-रिक्शा या साइकिल पर आ सकते थे? पर नहीं, 'शक्ति प्रदर्शन' भी तो जरूरी है। पीएम साहब कहते रह गए"सादगी अपनाओ", और यहाँ कार्यकर्ताओं ने सादगी को ही तमाशा बना दिया।

27 किलोमीटर का यह सफर किसी 'रोड शो' से कम नहीं था। फूल, मालाएं, नारे और वो धूल उड़ाती गाड़ियांसब मिलकर चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थीं कि "नेताजी की भौकाली पूरी तरह से टाइट है!" वाह रे सादगी! अगली बार शायद कोई नेता जी पैदल चलें और पीछे एक हेलीकॉप्टर निगरानी के लिए उड़ता रहे, तो भी ताज्जुब मत कीजिएगा। आखिर कार्यकर्ताओं का प्यार है, कैसे रोकेंगे?
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