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डीबी स्टॉक कंसल्टेंसी घोटाला मामले में दीपांकर बरमन को मिली जमानत:-

कथित बहुचर्चित डीबी स्टॉक कंसल्टेंसी पोंजी घोटाला मामले में मुख्य आरोपी दीपांकर बरमन को गौहाटी उच्च न्यायालय से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने उन्हें जमानत प्रदान कर दी है। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की जांच प्रक्रिया और गिरफ्तारी की कानूनी प्रक्रिया को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह दलील रखी गई कि दीपांकर बरमन को गिरफ्तार करने से पूर्व कोई औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया गया था। अदालत ने इस पहलू को गंभीरता से लिया। आरोप यह भी लगाया गया कि मामले से जुड़े अन्य व्यक्तियों को जहां विधिसम्मत नोटिस भेजे गए, वहीं बरमन के मामले में समान प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इसी कथित प्रक्रियागत त्रुटि को जमानत मिलने का एक महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अब यह चर्चा तेज हो गई है कि सीबीआई द्वारा गिरफ्तारी प्रक्रिया में हुई कथित चूक और तकनीकी खामियों ने अदालत के निर्णय को प्रभावित किया। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जांच एजेंसियों द्वारा निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पूर्ण पालन न करना कई बार गंभीर मामलों में भी आरोपियों को राहत दिला सकता है।डीबी स्टॉक कंसल्टेंसी मामला असम के सबसे चर्चित आर्थिक घोटालों में से एक माना जा रहा है। इस मामले की जांच सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) दोनों एजेंसियां कर रही हैं। आरोप है कि वर्ष से के बीच एक अनियमित निवेश योजना चलाई गई, जिसमें निवेशकों को अत्यधिक और असामान्य रिटर्न का लालच दिया गया। जांच एजेंसियों का दावा है कि लगभग , निवेशकों को कथित रूप से ठगा गया और कुल जमा राशि करोड़ से अधिक हो सकती है। मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने हाल ही में . करोड़ मूल्य की संपत्तियां अटैच की थीं। इनमें भूमि, फ्लैट, कार्यालय परिसर, बैंक खाते तथा विभिन्न निवेश शामिल हैं। ये संपत्तियां असम के अलावा हैदराबाद और विशाखापट्टनम जैसे शहरों में स्थित बताई जा रही हैं। ईडी का आरोप है कि इन संपत्तियों का संबंध कथित अवैध निवेश और धन शोधन गतिविधियों से है। इस पूरे मामले ने एक बार फिर राज्य में अनियमित निवेश योजनाओं, वित्तीय धोखाधड़ी और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है। निवेशकों के बीच अभी भी अपने धन की वापसी को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, जबकि जांच एजेंसियां मामले की वित्तीय परतों को खंगालने में जुटी हुई हैं।

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