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गलत राजस्व प्रविष्टियों के आधार पर संपत्ति के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 300-ए के तहत मिले संपत्ति के अधिकार को गलत राजस्व प्रविष्टियों के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि भू-धारकों को कानून के अनुसार नोटिस ही जारी नहीं किया गया, तो रिकॉर्ड सुधारने में हुई देरी को आधार बनाकर उन्हें उनकी जमीन से वंचित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस सिद्धेश्वर एस. थोम्बरे रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें मंत्री द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके जरिए उप निदेशक, भू-अभिलेख का आदेश रद्द कर दिया गया था। उप निदेशक ने याचिकाकर्ता के पक्ष में राजस्व रिकॉर्ड बहाल करने का निर्देश दिया था।

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसने 16 फरवरी 1982 को पंजीकृत विक्रय विलेख के जरिए कृषि भूमि खरीदी थी। उसका कहना था कि चकबंदी योजना लागू होने के बाद उसके नाम दर्ज भूमि का क्षेत्रफल गलत तरीके से 82 आर से घटाकर 28 आर कर दिया गया।

अदालत ने कहा कि विक्रय विलेख और याचिकाकर्ता के पक्ष में स्वामित्व संबंधी डिक्री को लेकर कोई विवाद नहीं है। रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट है कि चकबंदी योजना लागू होने से पहले याचिकाकर्ता के पास 82 आर भूमि थी, लेकिन बाद में राजस्व रिकॉर्ड में केवल 28 आर भूमि दर्ज दिखाई गई।

हाईकोर्ट ने कहा कि राजस्व अधिकारी रिकॉर्ड के संरक्षक होते हैं और यह बताना उनकी जिम्मेदारी है कि भूमि क्षेत्र में इतनी कमी कैसे हुई। अदालत ने कहा कि अधिकारियों द्वारा की गई गलत प्रविष्टियों के लिए याचिकाकर्ता को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने महाराष्ट्र विखंडन निवारण और जोत समेकन अधिनियम, 1947 के उद्देश्य का उल्लेख करते हुए कहा कि इस कानून का मकसद बेहतर खेती के लिए भूमि का समेकन करना है, न कि भू-स्वामियों की जमीन कम या ज्यादा करना।

हाईकोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 15ए, 20, 21 और 22 के तहत चकबंदी योजना तैयार करते समय भू-धारकों को नोटिस देना और ग्राम समिति से परामर्श करना अनिवार्य है।

अदालत ने कहा,

सिर्फ इसलिए कि चकबंदी योजना पहले लागू हो चुकी थी, याचिकाकर्ता को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब भूमि क्षेत्र में कमी गलत राजस्व प्रविष्टियों के कारण हुई हो। संविधान के अनुच्छेद 300-ए के तहत संपत्ति का अधिकार गलत प्रविष्टियों के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।

देरी के मुद्दे पर अदालत ने कहा कि न तो 1947 के अधिनियम में और न ही महाराष्ट्र भूमि राजस्व संहिता में ऐसी प्रविष्टियों को सुधारने के लिए कोई निश्चित समय सीमा तय की गई।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि भू-धारकों को नोटिस ही नहीं दिया गया और रिकॉर्ड बिना सूचना के तैयार कर दिए गए, तो केवल देरी के आधार पर उन्हें संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने माना कि अधिकारियों की लापरवाही और अव्यवस्थित तरीके से चकबंदी योजना लागू करने के कारण किसी भी परिस्थिति में भू-स्वामी को उसकी जमीन से वंचित नहीं किया जा सकता।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने मंत्री का आदेश रद्द करते हुए याचिका मंजूर की।

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