कांग्रेस ने भाजपा शपथ ग्रहण समारोह के बहिष्कार का किया ऐलान, गौरव गोगोई ने ठुकराया निमंत्रण:-
असम में नई भाजपा नेतृत्व वाली सरकार के शपथ ग्रहण समारोह से पहले राज्य की राजनीति में बड़ा टकराव सामने आया है। कांग्रेस पार्टी ने आधिकारिक रूप से घोषणा की है कि वह भाजपा सरकार के शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार करेगी। इसी के साथ कांग्रेस नेता गौरव गोगोई द्वारा भाजपा की ओर से भेजा गया निमंत्रण अस्वीकार किए जाने की खबर ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गरमा दिया है। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार पार्टी ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया है कि वह ऐसे सरकारी आयोजनों में शामिल नहीं होगी, जिन्हें वह राजनीतिक रूप से असहमति और वैचारिक विरोध का प्रतीक मानती है। पार्टी का कहना है कि हालिया विधानसभा चुनावों के बाद राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेना उचित नहीं माना गया। गौरव गोगोई द्वारा निमंत्रण अस्वीकार किए जाने को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह केवल एक औपचारिक कार्यक्रम से दूरी बनाने का मामला नहीं, बल्कि भाजपा और कांग्रेस के बीच बढ़ते राजनीतिक ध्रुवीकरण का संकेत भी है। चुनाव परिणामों के बाद दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और वैचारिक टकराव लगातार तेज होते जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि विपक्ष की भूमिका केवल विधानसभा तक सीमित नहीं होती, बल्कि राजनीतिक संदेश देना भी उसका हिस्सा होता है। इसी रणनीति के तहत पार्टी ने शपथ ग्रहण समारोह से दूरी बनाने का निर्णय लिया है। पार्टी के भीतर यह भी चर्चा है कि विपक्ष को भाजपा के खिलाफ अधिक आक्रामक राजनीतिक रुख अपनाना चाहिए। दूसरी ओर भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के इस फैसले को लोकतांत्रिक परंपराओं से दूरी करार दिया है। भाजपा का कहना है कि शपथ ग्रहण जैसे संवैधानिक कार्यक्रमों को राजनीतिक विवाद से ऊपर रखा जाना चाहिए। पार्टी नेताओं का दावा है कि जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान सभी दलों को करना चाहिए। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस का यह कदम आने वाले समय में राज्य की राजनीति को और अधिक टकरावपूर्ण बना सकता है। असम विधानसभा चुनाव २०२६ के बाद भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक संघर्ष पहले से ही तेज है और अब शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार उस संघर्ष को सार्वजनिक रूप से और स्पष्ट कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रकार के बहिष्कार राजनीतिक संदेश देने का माध्यम होते हैं, लेकिन साथ ही यह विपक्ष और सरकार के बीच संवाद की दूरी को भी बढ़ा सकते हैं। आने वाले दिनों में विधानसभा के भीतर और बाहर दोनों दलों के बीच राजनीतिक बयानबाजी और अधिक तीखी होने की संभावना जताई जा रही है। फिलहाल असम की राजनीति में शपथ ग्रहण समारोह केवल संवैधानिक आयोजन नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन और राजनीतिक संकेतों का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि कांग्रेस के इस निर्णय पर भाजपा की आगे की राजनीतिक प्रतिक्रिया क्या होती है और इसका राज्य की आगामी राजनीतिक रणनीतियों पर क्या प्रभाव पड़ता है।