logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

इतिहास गवाह है कि जब-जब रक्षक भक्षक बन जाते हैं और सत्ता के गलियारे अपराधियों की शरणस्थली बन जाते हैं,

इतिहास गवाह है कि जब-जब रक्षक भक्षक बन जाते हैं और सत्ता के गलियारे अपराधियों की शरणस्थली बन जाते हैं, तब व्यवस्था को उखाड़ने के लिए किसी 'पद' की नहीं, बल्कि 'पात्रता' की ज़रूरत होती है। तिहावली में प्रकाश सिंह का लहू अभी सूखा नहीं है, लेकिन फतेहपुर के स्वघोषित नेताओं के ज़मीर का पानी ज़रूर सूख चुका है।

यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जो नेता वोट माँगते वक्त जनता के चरणों में लोट जाते हैं, वही विधायक हाकम अली खान और विपक्षी सूरमा श्रवण चौधरी, मधुसूदन भिंडा व नंदकिशोर महरिया आज पीड़ित परिवार की सिसकियों से मुंह फेर कर बैठे हैं। आखिर इन 'माननीयों' को किस बात का डर है? क्या प्रकाश सिंह की उठाई गई भ्रष्टाचार की फाइलें इनके भी काले चिट्ठों को बेनकाब करने वाली थीं?

अपनी छाती पर जनप्रतिनिधि का तमगा टांगने वालों, याद रखना जनता के पैसों का हिसाब मांगना अगर मौत को दावत देना है, तो तुम्हारी यह खामोशी भी इस 'लोकतांत्रिक हत्या' में बराबर की साझीदार है।

लेकिन अंधेरा कितना भी गहरा हो, कपिल, कैलाश, अशोक जैसे युवाओं ने मशाल थाम ली है। इन युवाओं का संघर्ष इसलिए महान नहीं है कि ये लड़ रहे हैं, बल्कि इसलिए महान है क्योंकि इन्हें हार का डर नहीं है। इन्हें पता है कि यह वही स्वार्थी समाज है जो चुनाव आते ही फिर उन्हीं भ्रष्ट चेहरों के पीछे घूमेगा, फिर भी ये लड़ रहे हैं। इन्होंने सत्ता की गुलामी के बदले संघर्ष की शहादत को चुना है।

#PolKhol

0
46 views

Comment