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52 फीसदी मतदान ने खड़े किए बड़े सवाल, क्या वोट डालना कानूनी रूप से अनिवार्य होना चाहिए? : ओ.पी. सिहाग

पंचकूला, 12 मई। पंचकूला नगर निगम चुनाव में मात्र 52 फीसदी मतदान होने पर सामाजिक चिंतक ओ.पी. सिहाग ने लोकतांत्रिक व्यवस्था और शहरी मतदाताओं की सोच पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि स्थानीय सरकार चुनने जैसे महत्वपूर्ण चुनाव में आधी आबादी का मतदान से दूर रहना लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत है।
ओ.पी. सिहाग ने कहा कि चुनाव आयोग, जिला प्रशासन, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों द्वारा हर चुनाव में लोगों को मतदान के लिए लगातार जागरूक किया जाता है। इसके बावजूद शहरों और पॉश सेक्टरों में रहने वाले बड़ी संख्या में लोग मतदान केंद्र तक पहुंचना जरूरी नहीं समझते।
उन्होंने कहा कि गांवों और गरीब बस्तियों में लोग उत्साह के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं, जहां कई बार मतदान प्रतिशत 80 से 90 फीसदी तक पहुंच जाता है। वहीं दूसरी ओर शहरों के पढ़े-लिखे और संपन्न वर्ग का एक बड़ा हिस्सा मतदान को महत्वहीन मानकर घरों में बैठा रहता है। यह मानसिकता लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती है।
सिहाग ने कहा कि जब जागरूक और सक्षम वर्ग चुनाव प्रक्रिया से दूरी बना लेता है तो इसका सीधा असर चुनाव परिणामों पर पड़ता है। कई बार योग्य और सक्षम नेतृत्व के बजाय ऐसे लोग चुनकर सामने आ जाते हैं जो जनता की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते। बाद में यही लोग सरकारी व्यवस्था और नागरिक सुविधाओं को लेकर शिकायत करते नजर आते हैं, जबकि उन्होंने स्वयं लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी नहीं निभाई होती।
उन्होंने सरकार से मांग की कि मतदान को लेकर सख्त नीति बनाई जानी चाहिए। उनका सुझाव है कि जो लोग जानबूझकर मतदान से दूर रहते हैं, उनके लिए कानून बनाया जाए ताकि चुनाव के समय मतदान करना कानूनी रूप से अनिवार्य किया जा सके।
सिहाग ने कहा कि लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं बल्कि जिम्मेदारियों से भी मजबूत होता है और मतदान हर नागरिक की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।
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