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बस्तर में मना सोमनाथ स्वाभिमान पर्व, प्रधानमंत्री के विजन और ऐतिहासिक गौरव पर हुई चर्चा

*समाचार*

जगदलपुर, 11 मई 2026/ बस्तर रियासत की पुरानी राजधानी स्थित प्राचीन शिव मंदिर का प्रांगण उस समय भक्ति और राष्ट्रवाद के अनूठे संगम का साक्षी बना, जब यहाँ सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का भव्य आयोजन किया गया। इस अवसर पर सोमनाथ मंदिर के उस अदम्य स्वाभिमान की गाथा भी गूंजी, जो सदियों के संघर्ष के बाद आज अपने पूर्ण वैभव के साथ खड़ा है। कार्यक्रम में विशेष रूप से उपस्थित जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती वेदवती कश्यप ने अपने उद्बोधन में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा सोमनाथ में 11 पवित्र तीर्थों के जल से किए गए अभिषेक का उल्लेख करते हुए इसे भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान का प्रतीक बताया।

जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती कश्यप ने मंदिर के गौरवशाली इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व सोमनाथ मंदिर को जिस तरह नष्ट कर लूटपाट की गई थी, वह भारतीय इतिहास का एक काला अध्याय था। उसके बाद भी कई बार आक्रमणकारियों ने इस सनातन केंद्र को क्षति पहुंचाई, लेकिन हर बार महादेव के प्रति अटूट आस्था ने इसे वापस खड़ा कर दिया। उन्होंने याद दिलाया कि अंतिम बार 1951 में इस मंदिर के पुनर्निर्माण का महान कार्य संपन्न हुआ था और आज, एक हजार वर्ष पूर्व हुई उस भीषण लूटपाट के पश्चात मंदिर के इसी अटूट स्वाभिमान और पुनर्निर्माण की याद में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का आयोजन पूरे देश में गौरव के साथ किया जा रहा है। इस गरिमामयी उत्सव में जनपद पंचायत अध्यक्ष श्री संतोष बघेल में भी सभा को संबोधित किया। इस अवसर पर जिला पंचायत सदस्य श्रीमती शकुंतला कश्यप सहित अन्य जनप्रतिनिधि और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री प्रतीक जैन व अपर कलेक्टर श्री ऋषिकेश तिवारी विशेष रूप से उपस्थित रहे।

भक्ति की इस धारा को कलात्मक ऊंचाई देते हुए कलाकार निधि रावल और तरंग डांस एकेडमी की नन्हीं बालिकाओं ने कत्थक शैली में शिव तांडव की ऐसी ओजपूर्ण प्रस्तुति दी, जिसने उपस्थित जनसमूह में ऊर्जा का संचार कर दिया। वहीं गायत्री मानस परिवार बस्तर के शिव भजनों ने वातावरण को पूरी तरह आध्यात्मिक बना दिया। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं और भक्तों ने इस ऐतिहासिक संदर्भ वाले पर्व में हिस्सा लेकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति गर्व व्यक्त किया।

*हजार वर्षों की विरासत: बाणसागर के तट पर आज भी जीवंत है बस्तर का प्राचीन शिव मंदिर*

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक समृद्धि अपने भीतर कई अनसुलझे रहस्य और भव्य स्थापत्य समेटे हुए है। इसी गौरवशाली इतिहास का एक जीवंत प्रमाण ग्राम बस्तर में स्थित प्राचीन शिव मंदिर है, जिसका निर्माण करीब एक हजार साल पहले छिंदक नागवंशी राजाओं द्वारा कराया गया था। 11वीं शताब्दी की स्थापत्य कला को संजोए यह शिवालय बस्तर संभाग के दूसरे सबसे बड़े तालाब बाणसागर के किनारे अपनी पूरी भव्यता के साथ अडिग खड़ा है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 30 पर स्थित यह ग्राम रियासत काल में काकतीय राजाओं की राजधानी हुआ करता था, जिसका गौरवशाली इतिहास लगभग ढाई सौ वर्षों तक इस मिट्टी से जुड़ा रहा।

अपनी बेजोड़ निर्माण शैली और पुरातात्विक महत्व के कारण आज यह मंदिर केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण में है। मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई सूक्ष्म और कलात्मक मूर्तियां प्राचीन भारतीय शिल्प कौशल की कहानी कहती हैं, हालांकि समय-समय पर मूर्ति तस्करों की गतिविधियों ने इस धरोहर की कुछ प्राचीन प्रतिमाओं को काफी नुकसान पहुँचाया है। इस मंदिर की एक खास पहचान इसके मुख्य द्वार के ठीक ऊपर पत्थर पर उकेरी गई मयूर की आकृति है, जिसे लेकर एक बेहद रोचक तथ्य यह भी है कि यही आकृति कभी अविभाजित मध्यप्रदेश के पाठ्य पुस्तक निगम का आधिकारिक प्रतीक चिह्न हुआ करती थी।

वर्तमान में पुरातत्व विभाग द्वारा यहाँ की गई आकर्षक बागवानी ने मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगा दिए हैं, जिससे यह न केवल श्रद्धालुओं बल्कि पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गया है। आस्था के केंद्र के रूप में इस शिवालय की महत्ता आज भी वैसी ही बनी हुई है, जहाँ महाशिवरात्रि, कार्तिक पूर्णिमा और मकर संक्रांति जैसे विशेष अवसरों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। गौरतलब है कि बस्तर के इस शिव मंदिर के समकालीन ही नारायणपाल, छिंदगांव, समलूर, भैरमगढ़, गढ़ धनोरा और बारसूर में भी प्राचीन मंदिर स्थित हैं, जिनका निर्माण छिंदक नागवंशी राजाओं द्वारा ही किया गया था। इन सभी ऐतिहासिक स्थलों पर आज भी प्रतिवर्ष भव्य मेलों का आयोजन होता है

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