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भारतमाता नामक काल्पनिक देवी इसीलिए लायी गयी ताकि वास्तविक देवता, मन्त्र और देवालय से दूर करके हिन्दुओं को भटकाया जा सकें।

सनातन धर्म में भारत माता नाम की कोई देवी नहीं हैं। भारती नामक सरस्वती देवी और जन्मभूमि, राष्ट्रभक्ति हेतु पृथ्वी देवी हैं। इनकी शास्त्रीय पूजा ही फलित होती है। भारतमाता नामक काल्पनिक देवी इसीलिए लायी गयी ताकि वास्तविक देवता, मन्त्र और देवालय से दूर करके हिन्दुओं को भटकाया जा सकें। मदर रसिया, ब्रिटानिया, जर्मनिया आदि से प्रेरित भारत माता है जिसे कुटिलता से देवी दुर्गा से मिलता जुलता दिखाया ताकि हिन्दुओं की आस्था का दोहन हो। नरेन्द्र दत्त से लेकर नरेन्द्र मोदी तक "देवी देवताओं को भूल जाओ" वाला षड्यन्त्र चलता हुआ हिन्दूद्रोही संगठन "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" धीरे धीरे सनातन धर्म को खोखला कर रहा है।

पहले गुरुपरम्परा हटाकर झंडे के नाम पर मनमानी की, फिर वर्णाश्रम को हटाकर मुस्लिम और ईसाई को हिन्दुओं में घुसाया, फिर वास्तविक मन्दिरों पर कब्जा करके नकली धर्मगुरु खड़े किए, गोहत्यारों को भाई बताया, गोमांस खाना जीवनशैली बताया, विवाह की मर्यादा हटाकर समलैंगिकता और व्यभिचार का समर्थन किया, शास्त्रों को मिलावटी बताकर बदलने की बात कही, हिन्दूद्रोही अम्बेडकर, फुले, पेरियार आदि को महापुरुष बताया, इस्लाम के बिना हिन्दुत्व अधूरा, इस्लाम का विरोधी हिन्दू सोच का नहीं, कहकर हमारी हिन्दू पहचान पर आघात करना आदि अनन्त कुकर्म आरएसएस के हैं।

राष्ट्रीय मुस्लिम एवं ईसाई मञ्च चलाने वाले सङ्घी विधर्मियों के लिए देवताओं को गाली देने वाले अम्बेडकर और फुले को महापुरुष मानना हिन्दू सोच है, ब्राह्मणों को गाली देना भी हिन्दू सोच है और इस्लाम का विरोध करने वाला हिन्दू सोच का नहीं है। अब ये नकली मन्दिर और तीर्थ, नकली शक्तिपीठ बनवा रहे हैं। कभी ज्योतिर्लिंग में शास्त्रीय धारापात्र के स्थान पर मशीनी पाइप का शॉवर लगाना तो कभी अखण्ड ज्योति के नाम पर अयोध्या में चीनी मॉडल रख देना, ये सब इन नास्तिकों की अश्रद्धा के ही दुष्परिणाम हैं। अवधेशानन्द, राजेन्द्रदास, गोविन्ददेव, कैलासानन्द, मोरारी, ऋतम्भरा, धीरेन्द्र जैसे सैकड़ों गुलाम सङ्घ ने हिन्दू धर्म में विकृति हेतु जन्म दे रखे हैं। महर्षि वेदव्यास जी ने इन सब बातों की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी

अदृष्ट्वा शास्त्रकथनं ब्रह्महत्यैव गीयते।
देवानां भेदनिन्दे च देवतावध उच्यते॥
आत्महत्या हि सा प्रोक्ता जाबाले नात्र संशयः॥
*****
शास्त्रार्थमन्यथा यस्तु व्याख्यायति सुमन्दधी:।
स चापि ब्रह्महत्यायाः पातकी परिगीयते॥
यः पुराणेषु चार्थेषु स्वयं श्लोकादि कल्पयेत्।
स चापि ब्रह्महत्यायाः पातकी परिगीयते॥
*****
कल्पयिष्यन्ति शास्त्राणि स्वबुध्या देवता अपि।
त्यक्ष्यन्ति धर्मशास्त्राणि निन्दयिष्यन्ति तान्यपि॥
*****
अन्तःशठा महाक्रूरा परद्रव्याभिलिप्सवः।
भ्रमन्ते वैष्णवैर्वेशधारयिष्यन्त्यसज्जनान्॥
पुराणार्थविदां साधुशीलानाञ्च द्विजन्मनाम्।
देवताद्वेषकास्ते वै द्वेषयिष्यन्ति सर्वदा॥
अन्यवर्णाश्रमश्चिह्नरन्येऽधिष्यन्ति लोभिन:।
(बृहद्धर्मपुराणे)

हे जाबाले ! जो व्यक्ति बिना शास्त्रों को ठीक से देखे ही उनके विषय में कथन दे देता है, उसे पाप को ब्रह्महत्या के समान समझना चाहिए। देवताओं में भेद देखने वाले एवं उनकी निन्दा करने वाले को देवतावध का पाप लगता है, जो आत्महत्या के ही समान है "इसमें संशय नहीं है"। जो शास्त्रों का मनमाना अर्थ लगाता है, और जो मूर्ख ऐसा ही व्याख्यान देता है, उसे भी ब्रह्महत्या के समान पातकी जानना चाहिए। जो पुराणों के अर्थों में अपनी कल्पना से ही श्लोकों को बताता है, (अथवा श्लोकों को ही काल्पनिक बताता है) उसे भी ब्रह्महत्या का ही दोषी बताया गया है। कलियुग में लोग अपने मन से शास्त्रों एवं देवताओं की कल्पना करके व्याख्या करेंगे। मान्य धर्मशास्त्रों को छोड़कर, उनकी निन्दा भी करेंगे। अन्दर से शठबुद्धि वाले, अत्यन्त क्रूर स्वभाव वाले, तथा दूसरे के धन के अपहरण की इच्छा रखने वाले लोग, केवल वैष्णव वेश धारण करके और अयोग्य लोगों को वैष्णव वेश धारण करा कर भ्रमण किया करेंगे। जो ब्राह्मण पुराणों के अर्थ को जानने वाले होंगे, अच्छा और शीलयुक्त आचरण करने वाले होंगे, उन लोगों से, तथा देवताओं से भी ये लोग द्वेष करेंगे। साथ ही, बिना शास्त्रोक्त अधिकार के ही अन्य वर्ण या आश्रम के चिह्न को (प्रतिष्ठा आदि के) लोभ से धारण कर लेंगे।
(बृहद्धर्म पुराण, उत्तरखण्ड)

श्रीमज्जगद्गुरु निग्रहाचार्य स्वामिश्री श्रीभागवतानन्द गुरु

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