हम पत्रकार की जीवन कथा फिर भी हमारी सुरक्षा के नाम पर ?
चप्पलें घिस जाती हैं
पत्रकारिता में,
हर कोई
सरस्वती की उपासना
नहीं करता.....
बहुत कुछ सुनना पड़ता है
समाज से,
परिवार से,
अपनों से भी
निकम्मा,
नकारा,
निठल्ला...
पर हम ने क्या पाया,
क्या खोया,
कितनी रातें
सच की तलाश में काट दीं,
कितनी बार
अपनी भूख से पहले
खबर को रखा
ये सिर्फ
एक पत्रकार की
अंतरात्मा जानती है।
भीड़ तालियाँ देखती है,
पर संघर्ष नहीं,
लोग खबर पढ़ लेते हैं,
पर उसके पीछे
घिसी हुई चप्पलें,
टूटी उम्मीदें
और जली हुई आत्मा
नहीं देख पाते।
पत्रकारिता
कभी-कभी पेशा नहीं,
एक ऐसा अकेलापन होती है
जहाँ आदमी
धीरे-धीरे खुद को
समाज के लिए लिख देता है।
रचना किशोर कुमार
दुर्ग छत्तीसगढ़