शाहपुर पटोरी: जनहित बनाम निजी हित की जंग, कहाँ बनेगा व्यवहार न्यायालय?
बिहार के समस्तीपुर जिले का शाहपुर पटोरी अनुमंडल इन दिनों एक गंभीर विमर्श और आक्रोश के दौर से गुजर रहा है। मुद्दा है व्यवहार न्यायालय (Civil Court) का स्थान चयन।
बीते शाम शहर की सड़कों पर उतरी मशालों की रोशनी ने न केवल प्रशासन को जगाने का प्रयास किया, बल्कि यह सवाल भी खड़ा किया कि क्या विकास की योजनाएं आम जनता की सहूलियत को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं या कुछ रसूखदारों के निजी लाभ के लिए?
आइए समझते है क्या है पूरा विवाद?
पटोरी अनुमंडल मुख्यालय, जो तीन प्रमुख ब्लॉकों (पटोरी, मोहनपुर और मोहिउद्दीननगर) का केंद्र है, वर्तमान में अपने कृषि फार्म की विशाल सरकारी भूमि पर स्थित है। विवाद तब शुरू हुआ जब प्रशासन द्वारा व्यवहार न्यायालय को अनुमंडल मुख्यालय से लगभग 6 किलोमीटर दूर मालपुर पंचायत में स्थापित करने का प्रस्ताव सामने आया।
शहरी क्षेत्र के बुद्धिजीवियों, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि जब मुख्यालय के पास ही पर्याप्त सरकारी भूमि उपलब्ध है, तो शहर से दूर निजी भूमि का अधिग्रहण (खरीद) कर सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ क्यों डाला जा रहा है?
दूसरी समस्या पटोरी के व्यवसायियों की तरफ से ये है कि पटोरी के नगर घोषित होने के बाद पटोरी के व्यवसायों पर अतिरिक्त कर का बोझ पड़ा है और अगर व्यवहार न्यायालय पटोरी से दूर चला जाएगा तो व्यापारिक गतिविधि भी नगर से शिफ्ट कर जायेगा ।
आंदोलन के ठोस तर्क को कुछ बिंदुओं से समझना होगा कि क्यों मालपुर का चयन अव्यावहारिक है?
1. सरकारी भूमि की उपलब्धता:- अनुमंडल मुख्यालय वर्तमान में जिस कृषि फार्म की जमीन पर है, वहां आज भी एक बड़ा भूखंड रिक्त पड़ा है। यदि अनुमंडल कार्यालय वहां बन सकता है, तो न्यायालय क्यों नहीं?
2. दूरी और आवागमन की समस्या:-मालपुर जाने के रास्ते में चंदन चौक का रेलवे क्रॉसिंग पड़ता है, जो अक्सर जाम की समस्या से जूझता है। आम जनता, विशेषकर मोहनपुर और मोहिउद्दीननगर के दूर-दराज के गांवों से आने वाले लोगों के लिए 6 किमी का अतिरिक्त सफर और ट्रैफिक की बाधा मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना का कारण बनेगी।
3. प्रशासनिक समन्वय:-SDM कार्यालय और अन्य महत्वपूर्ण सरकारी दफ्तर अनुमंडल परिसर में ही हैं। न्यायालय का वहां से दूर होना न केवल वकीलों बल्कि उन फरियादियों के लिए भी मुसीबत होगा जिन्हें एक ही दिन में दोनों जगहों पर काम पड़ सकता है।
4. सरकारी धन का दुरुपयोग:- जब सरकार के पास अपनी जमीन (कृषि फार्म) मौजूद है, तो भारी भरकम राशि खर्च कर नई जमीन खरीदना 'राजस्व की बर्बादी' के अलावा और क्या है?
5. कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं के द्वारा इससे संबंधित ज्ञापन जिलाधिकारी को भी सौंपा गया है जो जनहित में है ।
मशाल जुलूस के आक्रोश की गूँज
बीते शाम चंदन चौक, कवि चौक, सिनेमा चौक और अंबेडकर चौक से होते हुए पटोरी स्टेशन तक निकाला गया "मशाल जुलूस" इस बात का प्रतीक है कि जनता अब खामोश नहीं रहेगी। इस जुलूस में वकील संघ के अध्यक्ष, सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय नेताओं की मौजूदगी ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह मांग किसी एक गुट की नहीं, बल्कि समूचे क्षेत्र की साझी मांग है।
कृषि फार्म की जमीन का पेंच: तर्क या बहाना?
प्रशासनिक गलियारों में एक तर्क यह दिया जा रहा है कि कृषि फार्म की जमीन 'कृषि कार्यों' के लिए आरक्षित है। लेकिन यहाँ जनता का सवाल बिल्कुल सीधा और चुभने वाला है
"अगर इसी तर्क पर न्यायालय नहीं बन सकता, तो पूर्व में अनुमंडल कार्यालय का निर्माण उसी जमीन पर कैसे हुआ?"
क्या नियम समय के साथ बदल जाते हैं, या फिर यह केवल मालपुर में जमीन खरीद की प्रक्रिया को जायज ठहराने का एक बहाना है?
जनहित सर्वोपरि होना चाहिए
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में 'जनहित' (Public Interest) से ऊपर कुछ नहीं होता। व्यवहार न्यायालय जैसे संस्थान का उद्देश्य न्याय को सुलभ और निकट बनाना है, न कि उसे जनता की पहुंच से दूर करना।
यदि प्रशासन और सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार नहीं करते, तो यह आशंका बलवती हो जाती है कि कहीं यह निर्णय जनहित को ताक पर रखकर "निजी स्वार्थों" की सिद्धि के लिए तो नहीं लिया जा रहा? पटोरी की जनता का यह संघर्ष केवल एक स्थान के लिए नहीं, बल्कि सही प्रशासनिक निर्णय और पारदर्शिता के लिए है।
"हवाएं चुप है मगर सन्नाटा बड़ा गहरा है, पटोरी की हर आंख में आज जनहित पहरा है । फैसला वही हो जो आवाम के चौखट के करीब हो , वरना इतिहास लिखेगा कि प्रशाशन का रवैया कितना बहरा है।"
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT