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कविता : मेरा देश

यह देश मेरा मंदिर भी है,
यह देश मेरी शान है,
इस मिट्टी की हर खुशबू में,
बसता हिन्दुस्तान है।

हिमालय जिसका मुकुट बना,
सागर जिसके पाँव धरे,
गंगा-जमुना की पावन धारा,
जन-जन के मन को छूती फिरे।

कश्मीर की वादी गाती है,
राजस्थान की रेत सुनाती,
पंजाब के खेतों की हरियाली,
मेहनत की गाथा दोहराती।

बंगाल की संस्कृति मीठी,
बिहार ज्ञान की खान है,
झारखंड के जंगल कहते,
प्रकृति यहाँ भगवान है।

तमिलनाडु के मंदिर बोलें,
केरल की बारिश गाए गीत,
गुजरात की धरती पर देखो,
मेहनत करती हर एक प्रीत।

यहाँ अनेक भाषाएँ मिलकर,
एकता का दीप जलातीं,
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई,
मिलकर भारत माँ कहलातीं।

यह बुद्ध की करुणा वाली,
नानक का संदेश यहाँ,
राम-कृष्ण की मर्यादा है,
सूफ़ी संतों का वेश यहाँ।

जब-जब संकट आया देश पर,
वीरों ने बलिदान दिया,
हँसते-हँसते फाँसी चूमी,
मिट्टी को सम्मान दिया।

Bhagat Singh की गूँज आज भी सुनती,
Subhas Chandra Bose का साहस जीवित है,
Mahatma Gandhi की सत्य-अहिंसा,
हर दिल में अब भी स्थापित है।

सीमा पर जो सैनिक जागे,
उनसे सुरक्षित घर-आँगन,
उनकी वजह से हँसता रहता,
हर बच्चे का कोमल जीवन।

मेरे देश की धूल अनोखी,
सोने से बढ़कर लगती है,
इसकी खातिर जीना-मरना,
हर दिल को अच्छा लगता है।

आओ मिलकर वचन ये लें हम,
देश का मान बढ़ाएँगे,
नफ़रत की दीवार गिराकर,
प्रेम का दीप जलाएँगे।

जब तक सूरज-चाँद रहेगा,
भारत तेरा नाम रहेगा,
तेरी मिट्टी का हर कण भी,
दुनिया में सम्मान रहेगा।

जय हो भारत माँ की जय,
जन-जन का अभिमान रहे,
हम सब मिलकर आगे बढ़ें,
देश सदा महान रहे।

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