खुशियों के आंगन में 'विषाक्त' भोजन का तांडव: गया में 50 से अधिक बीमार, क्या हम अपनी लापरवाही से दूसरों की जान जोखिम में डाल रहे हैं?
खुशियों के आंगन में 'विषाक्त' भोजन का तांडव:
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
शेरघाटी: बिहार के गया जिले के गुरुआ प्रखंड से आई खबर न केवल चौंकाने वाली है, बल्कि एक गंभीर चेतावनी भी है।
धाना विगहा गाँव में एक तिलक समारोह की खुशियाँ उस वक्त चीख-पुकार में बदल गईं, जब भोज का आनंद ले रहे दर्जनों लोग अचानक मौत और जिंदगी की जंग लड़ने लगे।
जिस घर में मंगल गीत गाए जा रहे थे, वहां एम्बुलेंस के सायरन और मरीजों के कराहने की आवाजें गूँजने लगीं।
लापरवाही का विश्लेषण:
यह कोई पहली घटना नहीं है जब किसी उत्सव में परोसा गया भोजन 'धीमा जहर' साबित हुआ हो।
भीषण गर्मी के इस मौसम में भोज का आयोजन करना और खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को नजरअंदाज करना एक आपराधिक लापरवाही की तरह है।
प्राथमिक जांच में इसे 'फूड पॉइजनिंग' (खाद्य विषाक्तता) बताया जा रहा है।
सवाल यह उठता है कि क्या खाना बनाने में इस्तेमाल किए गए मसालों, तेल या पानी की शुद्धता की जांच हुई थी?
या फिर बढ़ती गर्मी के बीच बासी या खराब हो चुके खाद्य पदार्थों को परोस दिया गया?
व्यवस्था और जागरूकता का अभाव:
अक्सर गांवों में सामूहिक भोज के दौरान स्वच्छता के मानकों को ताक पर रख दिया जाता है।
हलवाई और कैटरर्स मुनाफे के चक्कर में घटिया सामग्री का उपयोग करते हैं, जिसका खामियाजा निर्दोष मेहमानों को भुगतना पड़ता है।
गुरुआ की यह घटना हमें याद दिलाती है कि उत्सव की चकाचौंध में 'सुरक्षा' प्राथमिक होनी चाहिए, न कि दिखावा।
निष्कर्ष :
गुरुआ प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग ने त्वरित कार्रवाई कर स्थिति को संभाला है, लेकिन क्या प्रशासन को ऐसे सामूहिक आयोजनों के लिए पहले से कोई गाइडलाइन जारी नहीं करनी चाहिए?
विशेषकर गर्मी के महीनों में खाद्य सुरक्षा विभाग को अधिक सक्रिय होने की आवश्यकता है।
यह घटना समाज के लिए एक कड़ा सबक है। आयोजकों को समझना होगा कि आपका एक गलत फैसलाचाहे वह सस्ते सामान की खरीद हो या भोजन के रखरखाव में लापरवाहीकिसी के परिवार का चिराग बुझा सकता है।
उत्सव वही है जो खुशियाँ बाँटे,बीमारियांऔर डर नहीं।