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क्या अब न्यायालय से ही न्याय मिलेगा?

पूर्व आईएएस और स्थाई राजधानी गैरसैण समिति के संयोजक विनोद प्रसाद रतूड़ी जी ने एक साक्षात्कार मे बताया की.....सितंबर 2025 से स्थायी राजधानी गैरसैंण समिति ने लोकतांत्रिक दायरे में रहकर अपनी मांग को हर संभव तरीके से उठाया। धरना-प्रदर्शन हुए, जनसभाएँ हुईं, गाँव-गाँव जनयात्राएँ निकाली गईं, जनता को जागरूक किया गया, सरकार तक अपनी आवाज पहुँचाने का हर शांतिपूर्ण प्रयास किया गया। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि सरकार ने इस गंभीर और ऐतिहासिक विषय को सुनने की इच्छाशक्ति अब तक नहीं दिखाई।
पूर्व आईएएस और स्थाई राजधानी गैरसैण समिति के संयोजक विनोद प्रसाद रतूड़ी जी ने एक साक्षात्कार मे बताया की.....सितंबर 2025 से स्थायी राजधानी गैरसैंण समिति ने लोकतांत्रिक दायरे में रहकर अपनी मांग को हर संभव तरीके से उठाया। धरना-प्रदर्शन हुए, जनसभाएँ हुईं, गाँव-गाँव जनयात्राएँ निकाली गईं, जनता को जागरूक किया गया, सरकार तक अपनी आवाज पहुँचाने का हर शांतिपूर्ण प्रयास किया गया। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि सरकार ने इस गंभीर और ऐतिहासिक विषय को सुनने की इच्छाशक्ति अब तक नहीं दिखाई।
स्थाई राजधानी गैरसैंण की मांग अब केवल भावनाओं का विषय नहीं रही, यह संवैधानिक अधिकार, जनभावनाओं के सम्मान और उत्तराखंड के संतुलित विकास का प्रश्न बन चुकी है। वर्षों से राज्य की जनता यह सवाल पूछ रही है कि जब उत्तराखंड आंदोलन की मूल आत्मा पर्वतीय जनमानस, क्षेत्रीय संतुलन और गैरसैंण जैसी केंद्रीय भौगोलिक स्थिति पर आधारित थी, तो फिर पच्चीस वर्षों बाद भी स्थाई राजधानी का निर्णय अधर में क्यों है?
अब स्थाई राजधानी गैरसैंण समिति ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि यदि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों मिलकर जनता की इस ऐतिहासिक मांग को टालते रहेंगे, तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाएगा। यह कदम केवल कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि उन करोड़ों सपनों की आवाज है जिन्हें वर्षों से आश्वासनों के नाम पर टाला गया।
उत्तराखंड की जनता जानना चाहती है कि आखिर क्यों हर चुनाव में गैरसैंण का नाम लिया जाता है, लेकिन सत्ता मिलते ही मुद्दा ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है? क्यों राज्य आंदोलनकारियों के बलिदान, मातृशक्ति के संघर्ष और युवाओं की उम्मीदों को नजरअंदाज किया गया? क्यों राजधानी का प्रश्न राजनीतिक सुविधा का विषय बना दिया गया?
यदि मामला न्यायालय तक जाता है, तो पक्ष और विपक्ष को अब 25-26 सालों का जवाब देना पड़ेगाक्या जनता से किए गए वादे केवल वोट लेने के लिए थे? क्या राज्य निर्माण की मूल भावना से छल किया गया? क्या पर्वतीय क्षेत्रों के अधिकारों की लगातार उपेक्षा नहीं हुई? बिना राजधानी के राज्य को कब तक अपने निजी लक्ष्य के लिए उपयोग करते रहोगे?
गैरसैंण केवल राजधानी नहीं, उत्तराखंड की अस्मिता, पहचान और न्यायपूर्ण विकास का प्रतीक है। अब समय आ गया है कि निर्णय होया तो सरकारें अपना वचन निभाएं नही तो अब न्यायालय ही जनता के अधिकारों की रक्षा करेगी.
उत्तराखंड की जनता अब मौन नहीं रहेगी । संघर्ष का नया अध्याय शुरू हो चुका है, और इस बार सवाल सीधे होंगे, जवाब भी सीधे देने होंगे। स्थाई राजधानी गैरसैंण केवल मांग नहीं, हर उत्तराखंडी का अधिकार है।
स्थाई राजधानी गैरसैंण की मांग अब केवल भावनाओं का विषय नहीं रही, यह संवैधानिक अधिकार, जनभावनाओं के सम्मान और उत्तराखंड के संतुलित विकास का प्रश्न बन चुकी है। वर्षों से राज्य की जनता यह सवाल पूछ रही है कि जब उत्तराखंड आंदोलन की मूल आत्मा पर्वतीय जनमानस, क्षेत्रीय संतुलन और गैरसैंण जैसी केंद्रीय भौगोलिक स्थिति पर आधारित थी, तो फिर पच्चीस वर्षों बाद भी स्थाई राजधानी का निर्णय अधर में क्यों है?
अब स्थाई राजधानी गैरसैंण समिति ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि यदि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों मिलकर जनता की इस ऐतिहासिक मांग को टालते रहेंगे, तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाएगा। यह कदम केवल कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि उन करोड़ों सपनों की आवाज है जिन्हें वर्षों से आश्वासनों के नाम पर टाला गया।
उत्तराखंड की जनता जानना चाहती है कि आखिर क्यों हर चुनाव में गैरसैंण का नाम लिया जाता है, लेकिन सत्ता मिलते ही मुद्दा ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है? क्यों राज्य आंदोलनकारियों के बलिदान, मातृशक्ति के संघर्ष और युवाओं की उम्मीदों को नजरअंदाज किया गया? क्यों राजधानी का प्रश्न राजनीतिक सुविधा का विषय बना दिया गया?
यदि मामला न्यायालय तक जाता है, तो पक्ष और विपक्ष को अब 25-26 सालों का जवाब देना पड़ेगाक्या जनता से किए गए वादे केवल वोट लेने के लिए थे? क्या राज्य निर्माण की मूल भावना से छल किया गया? क्या पर्वतीय क्षेत्रों के अधिकारों की लगातार उपेक्षा नहीं हुई? बिना राजधानी के राज्य को कब तक अपने निजी लक्ष्य के लिए उपयोग करते रहोगे?
गैरसैंण केवल राजधानी नहीं, उत्तराखंड की अस्मिता, पहचान और न्यायपूर्ण विकास का प्रतीक है। अब समय आ गया है कि निर्णय होया तो सरकारें अपना वचन निभाएं नही तो अब न्यायालय ही जनता के अधिकारों की रक्षा करेगी.
उत्तराखंड की जनता अब मौन नहीं रहेगी । संघर्ष का नया अध्याय शुरू हो चुका है, और इस बार सवाल सीधे होंगे, जवाब भी सीधे देने होंगे। स्थाई राजधानी गैरसैंण केवल मांग नहीं, हर उत्तराखंडी का अधिकार है।
समिति द्वारा हस्ताक्षर अभियान भी चलाया जा रहा है, जिसे माननीय प्रधानमंत्री जी को भी भेजा जाएगा।

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