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बढ़ती स्कूल फीस पर फूटा अभिभावकों का गुस्सा, प्राइवेट स्कूलों पर शिक्षा माफिया होने के आरोप

देशभर में लगातार बढ़ रही प्राइवेट स्कूलों की फीस को लेकर अभिभावकों का गुस्सा अब खुलकर सामने आने लगा है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक, लोग शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि आज शिक्षा सेवा नहीं, बल्कि एक महंगा कारोबार बन चुकी है, जहाँ बच्चों के भविष्य के नाम पर मध्यमवर्गीय परिवारों की आर्थिक कमर तोड़ी जा रही है।

हाल के दिनों में कई राज्यों में स्कूल फीस वृद्धि, जबरन यूनिफॉर्म और किताबें खरीदवाने, एडमिशन चार्ज, डेवलपमेंट फीस और अन्य छिपे हुए शुल्कों को लेकर विरोध तेज हुआ है। लोगों का आरोप है कि कई निजी स्कूल शिक्षा के मंदिर नहीं, बल्कि कमाई के केंद्र बन गए हैं, जहाँ हर सुविधा के नाम पर अभिभावकों से मोटी रकम वसूली जाती है।

अभिभावकों का कहना है कि एक बच्चे की पढ़ाई का खर्च अब इतना बढ़ चुका है कि आम परिवारों को अपनी बचत तोड़नी पड़ रही है। कई परिवार बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज लेने या गहने गिरवी रखने तक को मजबूर हो रहे हैं। सबसे ज्यादा परेशानी मध्यमवर्गीय परिवारों को हो रही है, जो न तो सरकारी स्कूलों की व्यवस्था पर पूरी तरह भरोसा कर पा रहे हैं और न ही निजी स्कूलों की भारी फीस आसानी से चुका पा रहे हैं।

लोगों का आरोप है कि कई स्कूल हर साल फीस बढ़ाने के साथ-साथ किताबें, कॉपी, यूनिफॉर्म और अन्य सामान केवल तय दुकानों से खरीदने का दबाव बनाते हैं। इससे अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। शिक्षा को लेकर बढ़ती यह व्यावसायिक मानसिकता अब समाज में चिंता का बड़ा विषय बनती जा रही है।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल मुनाफा कमाना नहीं होना चाहिए। सरकार को निजी स्कूलों की फीस संरचना पर निगरानी रखने, पारदर्शिता सुनिश्चित करने और अभिभावकों की शिकायतों के समाधान के लिए सख्त नियम लागू करने की जरूरत है। कई सामाजिक संगठनों ने भी मांग की है कि स्कूल फीस निर्धारण के लिए स्वतंत्र नियामक आयोग बनाया जाए, ताकि मनमानी पर रोक लग सके।

वहीं, कुछ लोगों का यह भी कहना है कि सभी निजी स्कूलों को एक नजर से देखना सही नहीं होगा। कई स्कूल बेहतर शिक्षा, आधुनिक सुविधाएं और प्रशिक्षित शिक्षकों के कारण अधिक शुल्क लेते हैं। लेकिन सवाल तब उठता है जब शिक्षा सेवा के बजाय केवल व्यापार बनकर रह जाए।

बढ़ती फीस और शिक्षा के बाजारीकरण को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। अब देखना होगा कि सरकार और शिक्षा विभाग इस मुद्दे पर क्या कदम उठाते हैं और अभिभावकों को राहत देने के लिए कौन-सी नई नीतियां बनाई जाती हैं।

आपकी इस मुद्दे पर क्या राय है? क्या निजी स्कूलों की फीस पर सरकार को सख्त नियंत्रण करना चाहिए? कमेंट कर अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें।

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