रजिस्ट्री में प्रतिफल न मिलने पर कानूनी प्रावधान और विकल्प
कानूनी मामलों में आजकल ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं जहां रजिस्ट्री हो जाने के बाद भी जमीन का पूरा मूल्य विक्रेता को नहीं मिलता है या रजिस्ट्री में मूल्य चेक के रूप में मेंशन होता है जो बाद में बाउंस हो जाता है। भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 25 के अनुसार बिना प्रतिफल के अनुबंध शून्य होता है तथा संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 54 के अनुसार विक्रय तभी पूर्ण माना जाता है जब मूल्य का भुगतान हो या भुगतान का वचन दिया गया हो।
तीन प्रमुख परिस्थितियां हैं: पहली, यदि प्रतिफल की धनराशि बिल्कुल नहीं मिली तो रजिस्ट्री शून्यकरणीय हो सकती है और विक्रेता Specific Relief Act 1963 की धारा 31 के तहत न्यायालय में विक्रय विलेख रद्द करने का वाद दायर कर सकता है। दूसरी, यदि विलेख में लिखा हो कि मूल्य मिल गया लेकिन वास्तव में नहीं मिला तो यह धोखाधड़ी मानी जाती है और IPC की धारा 420 के तहत आपराधिक मामला बनता है। तीसरी स्थिति में यदि दिया गया चेक बाउंस हो जाता है तो Negotiable Instruments Act 1881 की धारा 138 के तहत आपराधिक अपराध माना जाता है तथा रजिस्ट्री निरस्तीकरण और चेक बाउंस दोनों मामले एक साथ चलाए जा सकते हैं।
न्यायालय में दीवानी वाद, आपराधिक शिकायत और स्थगन आदेश के लिए समय सीमा सामान्यतः 3 वर्ष होती है। आंशिक भुगतान होने और शेष राशि न मिलने पर न्यायालय विक्रेता को विकल्प देता है कि वह रजिस्ट्री निरस्त कर संपत्ति वापस प्राप्त करे या शेष राशि का भुगतान करवाए। यदि खरीदार शेष राशि जमा नहीं करता तो निरस्तीकरण होता है और विक्रेता की इच्छा को प्राथमिकता दी जाती है।