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महा-खोटाला या सिस्टम की क्रूरता?"कागजों पर बह रही विकास की गंगा, पर चारमळी की प्यास बुझाने में नाकाम रहा मारुळ का 'भ्रष्टाचार'!"

यावल (महाराष्ट्र): प्यास से सूखते गले, सिर पर भारी बर्तन और आंखों में सिस्टम के खिलाफ सुलगता आक्रोशये आज यावल तालुका के आदिवासी गांव चारमळी की पहचान बन चुकी है। 14वें और 15वें वित्त आयोग से लाखों के फंड का 'लंगर' बंटा, लेकिन इस दुर्गम डोंगर क्षेत्र की किस्मत में आज भी सिर्फ धूल और सूखी पाइपलाइनें हैं।
सरकारी तिजोरी खाली, पर गांव की प्याली सूखी!
दस्तावेजों की मानें तो चारमळी में पानी की किल्लत दूर करने के लिए लाखों रुपये बहाए जा चुके हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यहाँ की महिलाओं और बच्चों का आधा जीवन सिर्फ पानी ढोने में बीत रहा है। सवाल यह है कि:
अगर फंड आया, तो पाइपलाइन कहाँ है?
अगर मोटर लगी, तो पानी क्यों नहीं?
क्या जनता का पैसा 'मारुळ ग्राम पंचायत' के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया?
कटघरे में पंचायत: अब 'न्याय' की बारी!
मारुळ ग्राम पंचायत पर भ्रष्टाचार के काले बादल कोई नए नहीं हैं, लेकिन चारमळी की प्यास ने इस आग में घी का काम किया है। भ्रष्टाचार का यह घड़ा अब इतना भर चुका है कि मामला माननीय न्यायालय की चौखट तक जा पहुँचा है।
बड़ी अपडेट: > भ्रष्टाचार के इन गंभीर आरोपों पर 5 मई को निर्णायक सुनवाई होनी है। पूरे इलाके की सांसें थमी हुई हैंक्या इस बार 'साहबों' और 'सरपंचों' की कुर्सी डोलेगी?
"आंदोलन की चेतावनी: अब याचना नहीं, रण होगा!"
ग्रामीणों का सब्र अब जवाब दे चुका है। गांव के बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक, सबकी जुबान पर एक ही बात है"साहब, वोट के समय हाथ जोड़ते हो, पानी के समय मुंह मोड़ते हो!" ग्रामीणों ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि इस बार भी न्याय नहीं मिला और पानी की बूंद नसीब नहीं हुई, तो वे जेल भरो आंदोलन और कलेक्टर दफ्तर का घेराव करने से पीछे नहीं हटेंगे।
इम्पैक्ट पॉइंट (Impact Note)
जब 'डिजिटल इंडिया' और 'हर घर जल' के नारे गूंज रहे हों, तब चारमळी जैसे आदिवासी गांवों का प्यासा रहना शर्मनाक है। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि उन मासूम आदिवासियों के हक पर डकैती है। 5 मई की तारीख सिर्फ एक सुनवाई नहीं, बल्कि सिस्टम के लिए 'अग्निपरीक्षा' है।

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