गंगा एक्सप्रेसवे टोल पर बड़ा सवाल
गंगा एक्सप्रेसवे टोल पर बड़ा सवाल: क्या आम आदमी उठा पाएगा खर्च?
उत्तर प्रदेश में बन रहा गंगा एक्सप्रेसवे एक तरफ विकास का प्रतीक बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसके टोल शुल्क को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
मेरठ से प्रयागराज (लगभग 594 किमी) सफर का अनुमानित टोल:
🛵 दोपहिया वाहन: ₹905
🛺 तीनपहिया वाहन: ₹905
🚗 कार (आना-जाना): ₹3,600
🚐 हल्के वाणिज्यिक वाहन (LCV): ₹5,600
🚌 ट्रक/बस: ₹11,400
सवाल यह उठता है कि क्या इतना महंगा टोल आम भारतीय के लिए व्यावहारिक है?
वित्तीय मॉडल पर भी उठ रहे सवाल
परियोजना में करीब ₹9,000 करोड़ रुपये निजी निवेश (सेठ/कंपनी) द्वारा लगाए जाने की बात कही जा रही है।
शेष निवेश उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किया गया है।
जानकारी के अनुसार, यह ₹9,000 करोड़ बैंक लोन के माध्यम से जुटाया गया, जिसकी गारंटी सरकार ने ली है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि
जो पैसा बैंक से आया और गारंटी सरकार की है, उसमें निजी निवेशक का वास्तविक जोखिम कितना है?
25-30 साल तक टोल वसूली
समझौते के अनुसार, निजी कंपनी को 25 से 30 साल तक टोल वसूलने का अधिकार मिलेगा।
यानी आने वाले कई दशकों तक आम जनता को भारी टोल देना पड़ सकता है।
⚖️ पारदर्शिता की मांग
अब जनता के बीच यह मांग तेज हो रही है कि सरकार इस पूरे प्रोजेक्ट पर
📄 श्वेत पत्र (White Paper) जारी करे और स्पष्ट करे:
निजी निवेशक ने वास्तविक रूप से कितना पैसा लगाया?
सरकार की कुल हिस्सेदारी कितनी है?
टोल दरें किस आधार पर तय की गई हैं?
क्या यह एक्सप्रेसवे आम जनता के लिए है या सिर्फ संपन्न वर्ग के लिए?
क्या टोल दरें न्यायसंगत हैं?
और क्या इस मॉडल में पारदर्शिता पर्याप्त है?
गंगा एक्सप्रेसवे निश्चित रूप से उत्तर प्रदेश के लिए एक बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है, लेकिन
विकास तभी सार्थक होगा जब वह आम आदमी की पहुंच में भी हो।