आरक्षण ऐसे गरीब लोगों को मिलना चाहिए या फिर जाति के आधार पर?
क्या सवर्ण के बच्चे गरीबी में नहीं जीते?
कल के इस दृश्य से हृदय कांप गया
मन द्रवित हो गया
इस दृश्य ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया!!
यह दृश्य एक संदेश देगा इस समाज को भी और इस सरकार को भी !
घर जाने के लिए चौराहे पर खड़ा आटो का इंतजार कर ही रहा था कि तपती धूप में एक ओटो आकर रुकी
जिसको एक बच्चा चला रहा था जिसकी उम्र करीब 9 से 10 साल के आस पास ही लग रही थी!
बच्चा बोला अंकल बैठिए,कहा चलना है
और ये प्रद्युम्न तिवारी जी है जो इस बच्चे के ऑटो पर बैठने के बजाय उस मासूम बच्चे को निहारता रहे !
यह बच्चा कोई और नहीं बल्कि सवर्ण समाज का था जिसका नाम मारुति सिंह है
पिता स्वर्गीय सन्तोष सिंह
जो अभी पांच महीने पहले ही करंट लगने से मृत्यु हो चुकी है
ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी इन दोनों बच्चों पर है!
एक सवाल पूछना है सभी स्वर्ण समाज की तरफ से कि सरकार से भी और समाज से भी?
आरक्षण ऐसे गरीब लोगों को मिलना चाहिए या फिर जाति के आधार पर?
क्या सवर्ण के बच्चे गरीबी में नहीं जीते?
आखिर और कितने सालों तक आरक्षण के बेड़ियों में हमे बांधे रहेंगे?
राष्ट्रवाद के नाम पर हम कब तक अपने बच्चों की आहुति देते रहेंगे?
ऊपर से यह UGC
इससे सवर्ण समाज का विकास होगा
या विनाश?