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क्योंझर का 'कंकाल कांड': NHRC ने लिया संज्ञान; सिस्टम की बेरुखी ने गरीब भाई को दोहरी मुसीबत में डाला

ओडिशा के क्योंझर जिले में मानवता को शर्मसार करने वाली 'कंकाल कांड' की घटना ने अब राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ लिया है। अपनी मृत बहन के बैंक खाते से पैसे निकालने के लिए उसके अवशेषों (कंकाल) को झोले में भरकर बैंक पहुँचने वाले जीतू मुंडा के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने कड़ा रुख अपनाया है।
1. NHRC की कार्रवाई: जिला प्रशासन से जवाब तलब
सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में इस घटना के वायरल होने के बाद, NHRC ने इसे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना है।
रिपोर्ट की मांग: आयोग ने क्योंझर के जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक (SP) को नोटिस जारी कर एक सप्ताह (7 दिन) के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
जवाबदेही: आयोग ने पूछा है कि ऐसी क्या परिस्थितियां थीं कि एक व्यक्ति को अपनी बहन के अवशेषों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने पर मजबूर होना पड़ा और बैंक अधिकारियों ने इस मामले में संवेदनशीलता क्यों नहीं दिखाई।
2. सामाजिक दबाव और आर्थिक संकट: जीतू मुंडा की बढ़ती मुश्किलें
एक तरफ जहाँ जीतू मुंडा पहले से ही गरीबी और अपनी बहन के खोने के गम से जूझ रहे हैं, वहीं अब उन पर सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों का बोझ भी आ पड़ा है।
पुनः अंतिम संस्कार: चूंकि जीतू मुंडा ने अपनी बहन के अवशेषों को दफन की गई जगह से बाहर निकाला था, अब गांव के रीति-रिवाजों के अनुसार उन्हें धार्मिक विधि-विधान से दोबारा अंतिम संस्कार करना होगा।
सामुदायिक भोज (Village Feast): परंपरा के अनुसार, जीतू मुंडा को पूरे गांव के लिए भोज (Feast) का आयोजन करना अनिवार्य है।
दोहरी मार: जिस भाई के पास अपनी बहन के इलाज और पहले संस्कार के लिए पैसे नहीं थे, वह अब इस भारी खर्च के नीचे दब गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जीतू अब और भी गहरे आर्थिक संकट (Financial Distress) में फंस गए हैं।
3. सिस्टम पर सवाल: क्या नियम इंसानियत से बड़े हैं?
यह घटना न केवल बैंकिंग प्रणाली की संवेदनहीनता को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि ग्रामीण इलाकों में गरीब जनता के लिए सरकारी प्रक्रियाएं कितनी जटिल हैं।
बैंकिंग नियम: विशेषज्ञों का कहना है कि बैंक मैनेजर अक्सर 'केवाईसी' (KYC) और भौतिक उपस्थिति के नियमों की आड़ में मानवीय विवेक का उपयोग नहीं करते।
प्रशासनिक विफलता: यह जिला प्रशासन की भी विफलता है कि मृत्यु के बाद 'डेथ सर्टिफिकेट' और अन्य लाभों की प्रक्रिया को इतना सरल नहीं बनाया गया कि एक गरीब को ऐसे खौफनाक कदम उठाने पड़ें।
वर्तमान स्थिति
फिलहाल, जीतू मुंडा के घर पर सन्नाटा पसरा है और वे गाँव वालों की शर्तों को पूरा करने के लिए कर्ज लेने को मजबूर हैं। कुछ स्थानीय सामाजिक संगठनों ने जीतू की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाए हैं, लेकिन सरकारी सहायता का अब भी इंतजार है।
मानवाधिकार आयोग की टिप्पणी: "एक मृत व्यक्ति की गरिमा और उसके परिजनों के सम्मान की रक्षा करना राज्य का दायित्व है। बैंक अधिकारियों का रवैया प्रथम दृष्टया क्रूर और संवेदनहीन प्रतीत होता है।"

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