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9 जून 1964 को एक 5 फुट 2 इंच का दुबला-पतला आदमी #भारत का प्रधानमंत्री बना था और 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनकी रहस्यमयी मौत हो गई। कुल कार्यकाल लगभग

9 जून 1964 को एक 5 फुट 2 इंच का दुबला-पतला आदमी #भारत का प्रधानमंत्री बना था और 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनकी रहस्यमयी मौत हो गई। कुल कार्यकाल लगभग 19 महीने। बस 19 महीने।

इन 19 महीनों का वजन आज की कई पूरी सरकारों पर भारी पड़ता है। जिस आदमी को विदेशी प्रेस ने “अनलाइकली सक्सेसर” कहा, उसी ने पाकिस्तान को जवाब दिया, अमेरिका के दबाव को ठुकराया, किसानों को सम्मान दिया, सैनिकों का मनोबल बढ़ाया और देश को आत्मनिर्भरता की राह पर धकेल दिया।

नाम था #लाल_बहादुर_शास्त्री। कद छोटा था, काम हिमालय जितना बड़ा था।

आज देश में कैमरे की चमक को नेतृत्व समझ लिया गया है, भाषण को नीति और नारे को उपलब्धि। ऐसे समय में शास्त्री जी का नाम लेना ही कई लोगों की राजनीति पर तमाचा है। क्योंकि शास्त्री जी ने सत्ता को निजी ब्रांड नहीं बनाया, देश सेवा बनाया।

उन्होंने #प्रधानमंत्री बनते ही खुद की मूर्तियाँ नहीं लगवाईं, खुद का चेहरा हर दीवार पर नहीं चिपकवाया, हर योजना का नाम अपने ऊपर नहीं रखा। वे उन नेताओं में थे जो काम करके चुप रहते थे, आज वाले उन नेताओं में हैं जो चुप रहकर भी प्रचार करवा लेते हैं।

रेल मंत्री रहते हुए 1956 में अरियालुर रेल दुर्घटना हुई। आज के नेताओं की तरह जांच बैठाओ, बयान दो, विपक्ष को दोष दो, मीडिया मोड़ दो वाला खेल नहीं खेला। शास्त्री जी ने नैतिक जिम्मेदारी ली और इस्तीफा दे दिया। सोचिए, एक रेल दुर्घटना पर इस्तीफा।

आज तो पुल गिर जाए, ट्रेन भिड़ जाए, पेपर लीक हो जाए, बेरोजगार सड़क पर पिट जाएं, तब भी कुर्सी से चिपके रहते हैं जैसे फेविकोल की सरकारी स्कीम में आए हों।

प्रधानमंत्री बने तो देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। अमेरिका PL-480 के तहत गेहूं देकर दबाव बनाता था। शास्त्री जी ने कहा हम भूखे रह लेंगे, झुकेंगे नहीं। खुद एक वक्त उपवास रखा, देश से अपील की। पहले खुद त्याग किया, फिर जनता से कहा।

आज पहले जनता से गैस महंगी करवाओ, फिर खुद वातानुकूलित मंच से त्याग पर भाषण दो। यही फर्क है चरित्र और अभिनय में।

#शास्त्री_जी ने “जय जवान जय किसान” नारा दिया था। यह नारा चुनावी मंच की तुकबंदी नहीं था, राष्ट्रीय दर्शन था। उन्होंने 1965 युद्ध में सेना को खुला मनोबल दिया। पाकिस्तान के अयूब खान जिन्हें लगा था छोटा आदमी है, बाद में उसी आदमी की दृढ़ता माननी पड़ी।

दूसरी तरफ किसानों के लिए FCI, राष्ट्रीय बीज ढांचा, हरित क्रांति की नींव, डेयरी विकास के लिए NDDB, अमूल मॉडल का विस्तार। आज किसान सड़क पर बैठे रहें, महीनों मरते रहें, तब सरकार उन्हें राष्ट्रविरोधी बताने लगती है।

शास्त्री जी होते तो पहले बात करते, बाद में बिल लाते।

उनके पास अपनी कार तक नहीं थी। परिवार के कहने पर 12,000 रुपये का लोन लेकर फिएट कार खरीदी। मृत्यु के समय कर्ज बाकी था। पत्नी ने पेंशन से चुकाया। जरा तुलना कर लो। आज वार्ड स्तर का नेता करोड़पति, जिला स्तर वाला उद्योगपति, ऊपर वाला तो मानो चलता-फिरता विज्ञापन साम्राज्य। और एक प्रधानमंत्री ऐसा भी था जो कर्ज में मरा मगर ईमानदारी में अमर हो गया।

उनके बेटे को नौकरी में प्रमोशन मिला तो रद्द करवा दिया। सरकारी कार निजी काम में चली तो किलोमीटर का हिसाब लेकर पैसा जमा कराया। आज परिवारवाद पर भाषण देने वाले खुद रिश्तेदारों, मित्रों, चहेतों और कॉरपोरेट दरबारियों से घिरे रहते हैं। जनता को प्रवचन, अपने लोगों को संरक्षण। पुरानी चाल है, बस पैकिंग नई है।

शास्त्री जी फटा कुर्ता कोट के नीचे पहन लेते थे। कहते थे शर्म तब होनी चाहिए जब किसान नंगा सोए। आज शर्म किसे है? लाखों का सूट, करोड़ों का प्रचार, और जनता को डेटा पैक से राष्ट्रवाद डाउनलोड कराया जाता है।

किसान की आय दोगुनी का सपना दिखाकर लागत चौगुनी कर दी। बेरोजगार को ऐप दे दिया, मजदूर को भाषण, छात्र को परीक्षा घोटाला।

11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनकी मृत्यु हुई। आधिकारिक कारण हार्ट अटैक बताया गया। परिवार ने सवाल उठाए। पोस्टमार्टम नहीं हुआ। फाइलें वर्षों बंद रहीं। सरकारें बदलीं, राज बदला, पर सच पर ताला जस का तस।

कांग्रेस हो या बीजेपी, दोनों ने इस प्रश्न से दूरी बनाई। क्योंकि इतिहास की ईमानदार जांच से कई नकाब उतरते हैं, और सत्ता को नकाब बहुत प्रिय होता है।

आज कुछ लोग शास्त्री जी का नाम लेते हैं, पर उनकी आत्मा से डरते हैं। क्योंकि अगर शास्त्री मॉडल लागू हो जाए तो आधे नेता संपत्ति घोषित करते ही बेहोश हो जाएं, चौथाई इस्तीफा देने पड़ जाएं, बाकी प्रचार विभाग में नौकरी मांगते फिरें।

शास्त्री जी का जीवन बताता है कि देश भाषणों से नहीं, संस्थाओं से चलता है। नारे से नहीं, नीति से चलता है। फोटो से नहीं, फैसलों से चलता है।

नरेंद्र भाई और बीजेपी को सबसे ज्यादा खतरा विपक्ष से नहीं, शास्त्री जी जैसे नेताओं की स्मृति से है। क्योंकि जनता अगर तुलना करने लगी तो सवाल पूछेगी कि 19 महीने में जिसने युद्ध भी संभाला, कृषि भी संभाली, संस्थाएं भी खड़ी कीं, सादगी भी निभाई, वह बड़ा नेता था या वह जो वर्षों से सत्ता में रहकर भी हर विफलता का दोष पिछले 70 साल पर डालता है।

लाल बहादुर शास्त्री जी साबित करते हैं कि ऊंचाई शरीर की नहीं, रीढ़ की होती है। कुर्सी की नहीं, चरित्र की होती है। नाम पोस्टर से नहीं, त्याग से बनता है।

देश को आज फिर भाषणवीर नहीं, शास्त्री जैसे कर्मवीर चाहिए। बाकी पोस्टर तो बारिश में भीगकर उतर ही जाते हैं।

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