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पूजा में सिर ढकने की प्रथा पर विवाद, शास्त्रों के हवाले से उठे सवाल
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हाल के दिनों में पूजा-पाठ के दौरान सिर ढकने की बढ़ती प्रथा को लेकर धार्मिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है। कई लोग पूजन आरंभ होते ही रूमाल या कपड़ा सिर पर रख लेते हैं, जबकि कुछ विद्वानों और आचार्यों का कहना है कि यह शास्त्रसम्मत नहीं है।
धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के हवाले से बताया जा रहा है कि जप, ध्यान और देवपूजन के समय सिर ढकना निषेध माना गया है। विशेष रूप से कुर्म पुराण सहित अन्य ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि सिर या कण्ठ ढककर, अशुद्ध अवस्था में या अनुचित आचरण के साथ किया गया जप निष्फल हो सकता है।
कुछ विद्वानों का यह भी कहना है कि पूजा के समय शारीरिक और मानसिक शुद्धता अत्यंत आवश्यक है, जिसमें सिर खुला रखना भी एक महत्वपूर्ण नियम बताया गया है। वहीं, समाज के एक वर्ग का मानना है कि यह आस्था और परंपरा का विषय है, जिसे व्यक्ति अपनी सुविधा और श्रद्धा के अनुसार अपनाता है।
इस मुद्दे पर स्पष्टता के लिए धर्माचार्यों की राय अहम मानी जा रही है। जानकारों का कहना है कि किसी भी धार्मिक कर्मकांड को करने से पहले उसके शास्त्रीय नियमों को समझना जरूरी है, ताकि श्रद्धा के साथ-साथ विधि-विधान का भी पालन हो सके।