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नफरत के पत्थर टूटे, बुद्ध की करुणा ने ली जगह: कालादेव का ऐतिहासिक बदलाव,



विजय कुमार,वरिष्ठ पत्रकार

​मध्य प्रदेश के विदिशा जिले का एक छोटा सा गांव 'कालादेव', जो कभी दशहरे पर होने वाले हिंसक 'पत्थर युद्ध' के लिए जाना जाता था,
आज सामाजिक चेतना और समरसता की एक नई इबारत लिख रहा है।

इस गांव ने अपनी सदियों पुरानी हिंसक परंपरा को त्यागकर शिक्षा, आध्यात्मिकता और संवैधानिक मूल्यों को अपनाया है।

​हिंसा से शांति का सफर,
कालादेव की पहचान कभी पत्थरों से होने वाली लड़ाई थी, जिसमें अक्सर लोग घायल होते थे।
लेकिन अप्रैल 2020 में हरिशंकर बौद्ध ने अपने घर से बोधगया के के के बौद्ध द्वारा मिली प्रेरणा से शुरू की गई एक छोटी सी पहल ने पूरे गांव की दिशा बदल दी।

आज यहाँ हर बुधवार को ग्रामीण एकत्रित होते हैं, बुद्ध वंदना करते हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात—सामूहिक रूप से भारतीय संविधान की प्रस्तावना का पाठ करते हैं।

​संविधान और शिक्षा पर जोर,
इस बदलाव की सबसे खूबसूरत बात यह है कि ग्रामीण अब केवल धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित नहीं हैं।

गांव के 70 से अधिक परिवार इस मुहिम से जुड़ चुके हैं।
बच्चों को डॉक्टर और इंजीनियर बनाने का सपना दिखाया जा रहा है, और "खीर दान" जैसी परंपराओं के माध्यम से आपसी भाईचारे को मजबूत किया जा रहा है।

​निष्कर्ष
यदि समाज पुरानी और हानिकारक परंपराओं को छोड़कर शिक्षा और संवैधानिक मूल्यों की ओर बढ़ता है, तो कालादेव जैसे गांव पूरे देश के लिए 'मॉडल विलेज' बन सकते हैं।
यह लेख हमें याद दिलाता है कि वैचारिक परिवर्तन ही वास्तविक विकास की नींव है।

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