श्रावणी मेला 2026 नजदीक: बदलते रास्तों में बिखरती परंपरा, बिलासी का दर्शनीया मंदिर फिर याद दिला रहा आस्था का पुराना पड़ाव।
देवघर,
धनंजय राणा।
देवघर—यह केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारतीय सनातन संस्कृति की उस अनवरत प्रवाहित होती धारा का प्रतीक है, जहाँ आस्था, तपस्या और श्रद्धा सदियों से एक-दूसरे में विलीन होकर मानव जीवन को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती रही है। विश्वविख्यात बाबा वैद्यनाथ धाम, जिसे द्वादश ज्योतिर्लिंगों में विशेष स्थान प्राप्त है, आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का केंद्र बना हुआ है।
अब जब श्रावणी मेला 2026 की आहट सुनाई देने लगी है, और संभावित रूप से 4 अगस्त से इसके आरंभ होने की चर्चा है, तो एक बार फिर देवघर की धरती बोल बम के जयघोष से गूंजने को तैयार है। सुल्तानगंज से लगभग 105 किलोमीटर की कठिन कांवर यात्रा तय कर लाखों श्रद्धालु देवघर पहुंचेंगे।
लेकिन इसी उत्साह और आस्था के बीच एक सवाल फिर खड़ा हो रहा है—
क्या हम अपनी उन परंपराओं को भूलते जा रहे हैं, जिन्होंने इस यात्रा को पूर्णता दी?
वह दर्शनीया मंदिर, जहाँ से शुरू होती थी बाबा धाम की यात्रा
वर्षों पूर्व जब कांवरिये देवघर की सीमा में प्रवेश करते थे, तो उनका पहला पड़ाव होता था—बिलासी स्थित दर्शनीया मंदिर। इसे बाबा धाम यात्रा का प्रारंभिक द्वार माना जाता था।
परंपरा के अनुसार श्रद्धालु यहाँ सबसे पहले दर्शन करते थे, अपने गंगाजल को सुरक्षित रखते थे, पंचशूल का दर्शन करते थे और फिर मानसिक व आध्यात्मिक रूप से स्वयं को तैयार कर बाबा मंदिर की ओर प्रस्थान करते थे।
यह केवल धार्मिक प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि आस्था की अनुशासित और पवित्र परंपरा थी—एक ऐसी परंपरा, जो यात्रा को केवल दूरी तय करने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मिक साधना का मार्ग बनाती थी।
श्रावण मास में उमड़ती थी आस्था की बाढ़
सावन का महीना आते ही यह मंदिर श्रद्धालुओं से खचाखच भर जाता था। हजारों नहीं, बल्कि लाखों कांवरियों की भीड़ यहाँ उमड़ती थी। पूरा परिसर “बोल बम” के जयघोष से गूंज उठता था।
हर दिशा में भक्ति का उत्साह, हर चेहरे पर बाबा के दर्शन की उत्कंठा—यह दृश्य किसी आध्यात्मिक महाकुंभ से कम नहीं होता था।
रूट बदलते ही बदल गई परंपरा की दिशा
समय बदला, विकास की गति तेज हुई, सड़कें चौड़ी हुईं और यात्रा मार्गों का पुनर्निर्धारण हुआ। इसी बदलाव ने इस परंपरा की दिशा भी बदल दी।
रूट डायवर्सन के बाद श्रद्धालु अब अन्य रास्तों से सीधे बाबा धाम पहुंचने लगे। धीरे-धीरे बिलासी स्थित यह दर्शनीया मंदिर मुख्य यात्रा मार्ग से कटता चला गया।
आज स्थिति यह है कि जहाँ कभी लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती थी, वहाँ अब सन्नाटा और सीमित स्थानीय आस्था ही दिखाई देती है।
आज भी जीवित है आस्था, पर संघर्ष में है पहचान
हालांकि यह दर्शनीय मंदिर आज भी अपनी धार्मिक गरिमा को संजोए हुए है। मंदिर परिसर में महाकाल का स्थान, भगवान हनुमान मंदिर और माँ काली की प्रतिमा सहित अनेक देवी-देवताओं का वास है।
भक्ति आज भी उतनी ही प्रबल है, लेकिन भीड़ और पहचान पहले जैसी नहीं रही।
पुजारी ने क्या कहा
“एक समय था जब हर कांवरिया यहाँ रुकता था। पहले दर्शन यहीं होते थे, फिर लोग बाबा मंदिर जाते थे। सावन में लाखों की भीड़ रहती थी। अब रास्ता बदल गया तो श्रद्धालु भी कम हो गए।”
मंदिर पुजारन की पीड़ा – व्यवस्था अब भी अधूरी
“श्रावणी मेला नजदीक है, भीड़ भी बढ़ेगी, लेकिन यहाँ प्रशासन की कोई खास व्यवस्था नहीं होती। न सुरक्षा, न भीड़ नियंत्रण। श्रद्धालुओं को परेशानी होती है। कम से कम सावन में अस्थायी पुलिस बल की तैनाती होनी चाहिए।”
स्थानीय भक्त की प्रतिक्रिया
“यह दर्शनीय मंदिर हमारी पहचान है। पहले हर कोई यहाँ आता था, अब लोग सीधे निकल जाते हैं। प्रशासन को इस जगह को फिर से मुख्य धारा में लाने की कोशिश करनी चाहिए।”
देवघर उपायुक्त से अपेक्षा
अब जबकि श्रावणी मेला सिर पर है, जिला प्रशासन से यह अपेक्षा और भी बढ़ जाती है कि ऐसे ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के स्थलों को केवल उपेक्षित न छोड़ा जाए, बल्कि उन्हें संरक्षित और पुनर्जीवित किया जाए।
यदि यहाँ सुरक्षा, यातायात और बुनियादी सुविधाओं की समुचित व्यवस्था की जाए, तो यह दर्शनीय मंदिर एक बार फिर आस्था के केंद्र के रूप में स्थापित हो सकता है।
सवाल जो जवाब मांगता है
क्या विकास की अंधी दौड़ में हम उन पड़ावों को खोते जा रहे हैं, जिन्होंने हमारी धार्मिक यात्राओं को अर्थ दिया?
क्या बिलासी स्थित यह दर्शनीय मंदिर केवल इतिहास की एक धुंधली स्मृति बनकर रह जाएगा?
बाबा वैद्यनाथ धाम आज भी आस्था का शिखर है, लेकिन उसके आसपास के ऐसे प्राचीन स्थल—जो कभी इस यात्रा की आत्मा हुआ करते थे—उन्हें सहेजना और संरक्षित करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
क्योंकि आस्था केवल मंजिल तक पहुंचने का नाम नहीं है, बल्कि उन पड़ावों को जीवित रखने का भी संकल्प है, जिन्होंने इस यात्रा को पवित्रता और पूर्णता प्रदान की।