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शीर्षक: कलयुग का आईना और हमारी जिम्मेदारी

“हे रामचंद्र कह गए सिया से,
ऐसा कलजुग आएगा,
हंस चुगेगा दाना तिनका,
कौआ मोती खाएगा…”

हे रामचंद्र कह गए सिया से
गोपी

यह गीत सिर्फ एक फिल्मी पंक्ति नहीं, बल्कि आज के समाज का सटीक प्रतिबिंब बन चुका है। जब सच और झूठ की पहचान धुंधली हो जाए, जब योग्य को उसका हक न मिले और अयोग्य सत्ता और सम्मान पा जाए—तो समझिए कि समय ने करवट बदल ली है।

मेरा जन्म 1960 में हुआ। मैंने उस भारत को देखा है जहां मोहल्लों में भाईचारा था, जहां धर्म से पहले इंसानियत की पहचान होती थी, जहां त्योहार मिलकर मनाए जाते थे। उस दौर में नफरत नहीं, अपनापन था; राजनीति में भी मतभेद होते थे, पर मनभेद नहीं।

लेकिन आज, पिछले कुछ वर्षों में, समाज की दिशा बदलती दिखाई दे रही है। लोगों के दिलों में दूरी बढ़ी है, और विचारों में कठोरता आई है। दुख इस बात का है कि पढ़े-लिखे लोग भी नफरत और विभाजन की भाषा को अपनाने लगे हैं। यह सिर्फ किसी एक पार्टी या सरकार का सवाल नहीं, बल्कि पूरे समाज के सोचने का विषय है।

क्या हमने कभी खुद से पूछा है—
कि हम किस दिशा में जा रहे हैं?
क्या हम अपने बच्चों को वही भारत दे रहे हैं, जिस पर हमें गर्व था?

आज जरूरत है रुककर सोचने की।
सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन देश और समाज स्थायी होते हैं। अगर हम खुद ही सच और झूठ में फर्क करना छोड़ देंगे, अगर हम अपने विवेक को किसी भी विचारधारा के हाथों गिरवी रख देंगे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।

देश सिर्फ सत्ता से नहीं चलता,
देश चलता है—आपसी विश्वास से,
सहिष्णुता से,
और इंसानियत से।

हमें यह समझना होगा कि धर्म, जाति, और राजनीति के नाम पर बंटा हुआ समाज कभी मजबूत नहीं हो सकता। असली ताकत एकता में है, और वही भारत की पहचान रही है।

आज वक्त है कि हम फिर से उस भारत को याद करें—
जहां “इंसान” सबसे पहले था।

अगर हम सच में देशभक्त हैं,
तो हमें नफरत नहीं,
प्यार और समझदारी का साथ देना होगा।

— डॉ एम एस बाली
(देश चिंतक)

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