मां काली की भक्ति का सार
जानिए अनसुलझी गहरे तथ्यों को, जो आपके मन मस्तिष्क को हिला देगा....
माँ के सामने भक्त को अपने पद, प्रतिष्ठा, कपड़े और अहंकार को छोड़कर बिल्कुल वैसा ही आना पड़ता है जैसा वह वास्तव में होता है। माँ उस 'कच्चे' और 'सच्चे' इंसान से प्रेम करती हैं, न कि उस मुखौटे से जो समाज ने हमें दिया है। इसलिए अध्यात्म में माँ काली की नग्नता (दिगंबरा) इस बात का प्रतीक है कि वे 'माया' के किसी भी आवरण को स्वीकार नहीं करतीं। इसको भावनात्मक रूप में कैह सकते हैं पूर्ण पारदिर्शता। इसलिए माँ काली के गले में जो 50 मुंडों की माला है, यह संस्कृत के 50 अक्षरों (वर्णमाला) के प्रतीक हैं, जिन्हें 'मंत्र' शक्ति कहा जाता है तथा यह माला दर्शाती है कि माँ ने अपने बच्चों के 'अहंकार' को काटकर उसे अपने गले का आभूषण बना लिया है। इसलिए एक माँ के लिए उसके बच्चे की बुराई भी वैसी ही है जैसे बच्चा खेल में मिट्टी लगा लिया हो और माँ उस मिट्टी (अहंकार) को साफ कर के स्वच्छ रूप में बच्चे को स्वीकार कर लेती है। इसलिए मां काली को दूसरे रूप में शमशान की देवी भी कहा जाता, जिस प्रकार से शमशान में सब कुछ जलकर राख हो जाता है ठीक उसी प्रकार से मनुष्य के भीतर भी एक शमशान है, जहाँ हमारी पुरानी यादें, दुख और वासनाएँ जलती हैं और जलकर राख हो जाती है तथा माँ काली हमें यह सिखाती हैं कि जिसे दुनिया 'अंत' मानती है, वह असल में नई शुरुआत है। जो हमें मृत्यु के डर से मुक्त कर यह समझाती हैं कि जो जन्म लेता है, वह माँ की गोद (प्रकृति) में ही वापस लौटता है। इसलिए जब काली तांडव करते हुए शिव पर पैर रखती हैं, तो यह चेतना और ऊर्जा के मिलन का उच्चतम क्षण होता है। जो दर्शाता है कि जब हम भावनाओं में बहुत उग्र या अनियंत्रित हो जाते हैं, तो केवल 'शुद्ध चेतना' (शांत भाव) ही हमें थाम सकती है इसलिए मां काली का पैर शिव पर पड़ना इस बात का संकेत है कि शक्ति को भी दिशा के लिए आधार चाहिए।
इसलिए मां काली का रंग काला है। विज्ञान और अध्यात्म दोनों मानते हैं कि काला वह रंग है जो हर रंग को सोख लेता है। इसलिए एक भक्त के जीवन में जितने भी दुख, अपमान या अंधेरे हों, माँ काली उन सबको अपने भीतर समा लेती हैं, और मां काली 'ब्लैक होल' की तरह हैं जो नकारात्मकता को नष्ट कर उसे प्रकाश में बदल देती हैं। इसीलिए उन्हें 'करुणामयी' कहा जाता है, क्योंकि वे दुनिया का सारा जहर पीकर भक्तों को शांति प्रदान करती हैं।
इसलिए मां काली के प्रति भाव रखने का अर्थ है— निडर होना। वे सिखाती हैं कि अपनी कमियों को स्वीकार करो।अपने भीतर के राक्षसों (क्रोध, लोभ, मोह) से लड़ो। और यह विश्वास रखो कि जब दुनिया साथ छोड़ देगी, तब 'महाकाल' की शक्ति तुम्हें अपनी गोद में थाम लेगी।
इसलिए माना जाता है कि जब ब्रह्मांड का अंत होता है, तो सब कुछ महाकाल (शिव) में विलीन हो जाता है, और अंत में शिव भी काली में समा जाते हैं। काली वह 'शून्य' हैं जहाँ से सब शुरू होता है और जहाँ सब खत्म होता है। इसीलिए उन्हें 'आद्या' (शुरुआत से पहले वाली) कहा जाता है। इसलिए काली का नाम 'काल' से आया है, जिसका अर्थ है समय।
और समय सब देखता है और बार बार कहता है कि मैं समय हू, मै स्वत्र हुं और कुछ भी हमसे अलग नहीं है, सब मैं हूं।
इसलिए एक बार राधा के मन में काली के प्रति भय जागा। तब भगवान कृष्ण ने उन्हें यह समझाने के लिए कि शक्ति और प्रेम एक ही हैं, काली का रूप धारण किया था। इसलिए तंत्र में काली को 'कृष्ण-वर्णा' कहा गया है और कई साधक मानते हैं कि द्वापर युग में काली ही कृष्ण बनकर अवतरित हुई थीं। इसीलिए 'काली' और 'कृष्ण' दोनों ही शब्दों का अर्थ 'काला' या 'शून्य' होता है।इसलिए मां काली का स्वरूप जितना डरावना और उग्र प्रतीत होता है, उनकी कहानियाँ उतनी ही करुणा और गहरे आध्यात्मिक अर्थों से भरी हैं। जो मनुष्य को उन्हें आदर पूर्वक मानने जानने और पूजने की हमेशा प्रेरणा देता है और आस्था भाव से श्रद्धा रखता है। इसलिए मां काली में भक्ति का सार यह है कि अगर जिंदगी में सब कुछ बिखर जाय तो "जय मां काली" को याद कर के सुमिरन कर लीजिए अगर आपका विचार और प्रवृत्ति नेक होगी तो सदा ही कल्याण होगा।
"जय माता दी" जय मां काली " जय भवानी" जय शारदा मुखी " जय बगला मुखी" "
सप्रेम धन्यवाद
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