जनता दरबार —
दरवाज़ा खुला है,
पर सवाल यह है: क्या आदेश ज़मीन पर उतरते हैं?
"DM शशांक शुभंकर की सक्रियता सराहनीय "
विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार
बुधवार, 22 अप्रैल 2026 —
गया समाहरणालय के उस कार्यालय कक्ष में जहाँ फाइलों और आदेशों की दुनिया बसती है, आज कुछ घंटों के लिए बिहार के आम आदमी की दुनिया आ गई।
भूमि विवाद से परेशान किसान,
आवास योजना से वंचित गरीब,
स्वास्थ्य सेवा के लिए तरसते ग्रामीण,
और शिक्षा विभाग की उलझनों में फँसे अभिभावक?
जिले के विभिन्न प्रखंडों से लगभग 40 आवेदक जिलाधिकारी श्री शशांक शुभंकर के समक्ष अपनी व्यथा लेकर पहुँचे।
जनता दरबार चला।
समस्याएँ सुनी गईं।
निर्देश दिए गए।
यह खबर अच्छी है —
और इसे अच्छी खबर के रूप में ही दर्ज होना चाहिए। लेकिन एक जागरूक पत्रकार का दायित्व केवल सूचना देना नहीं, जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में प्रश्न उठाना भी है।
आज क्या हुआ?
जिलाधिकारी शशांक शुभंकर ने अपने नियमित दैनिक जनता दरबार में आज भी जनता की बात सुनी।
प्रमुख मामलों में —
कुजापी नगर अंचल से एक आवेदक ने शिकायत दर्ज कराई कि आहर एवं जल निकासी की सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण हो रहा है।
DM ने जिला पंचायत राज पदाधिकारी (DPRO) को जाँच कर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया।
कुछ आवेदकों ने जमीन मापी की माँग की, जिस पर DM ने संबंधित अंचलाधिकारी को कार्रवाई के निर्देश दिए।
विश्लेषण
DM शशांक शुभंकर का जनता दरबार —
एक सकारात्मक परंपरा,
यह स्वीकार करना ज़रूरी है कि DM शशांक शुभंकर ने पदभार संभालते ही स्पष्ट कर दिया था कि जिले में कामचोरी और लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी —
और दैनिक जनता दरबार उनकी उसी प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति है।
जिलाधिकारी ने जनता दरबार को प्रशासन और जनता के बीच संवाद का प्रभावी माध्यम बताया और
जमीन विवाद,
राजस्व,
शिक्षा,
स्वास्थ्य,
पेंशन,
आवास सहित सभी मामलों की सुनवाई का आश्वासन दिया था।
यह परंपरा निभाई जा रही है —
यह गया जिले के लिए शुभ संकेत है।
पर असली सवाल 'निर्देश' के बाद का है,
आहर और जल निकासी की ज़मीन पर अतिक्रमण — यह केवल कुजापी की नहीं, गया जिले के दर्जनों प्रखंडों की समस्या है।
सरकारी तालाब, आहर, पइन — ये सार्वजनिक जल संसाधन धीरे-धीरे अतिक्रमण की भेंट चढ़ रहे हैं।
DPRO को जाँच का निर्देश मिला —
लेकिन कितने दिन में रिपोर्ट आएगी?
रिपोर्ट के बाद क्या होगा?
अतिक्रमण हटाने की समयसीमा क्या है?
— इन सवालों के जवाब जनता दरबार में नहीं मिले।
जमीन मापी का मामला और भी पुराना दर्द है।
गया जिले में राजस्व न्यायालयों में वर्षों से लंबित मामलों की संख्या सैकड़ों में है।
अंचलाधिकारियों पर काम का बोझ इतना अधिक है कि आज का निर्देश महीनों बाद भी ज़मीन पर न उतरे — यह आशंका निराधार नहीं।
जनता दरबार की सीमाएँ
जनता दरबार एक उत्कृष्ट माध्यम है —
लेकिन यह अंतिम समाधान नहीं, पहली सुनवाई है।
यदि दरबार में दिए गए निर्देशों की अनुपालन निगरानी नहीं हुई, तो यह व्यवस्था धीरे-धीरे एक औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
जो आवेदक आज 22 अप्रैल को आया —
वह एक महीने बाद भी वही समस्या लेकर दोबारा आए,
तो जनता दरबार की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा।
प्राथमिक विद्यालय अफजलपुर शेरघाटी में कार्यरत महिला शिक्षक शान्ति कुमारी अपनी बकाया वैध वेतन भुगतान के लिए 15 बार वर्तमान जिलाधिकारी के जनता दरबार में न्याय की गुहार लगा रही है किंतु आज तक निराकरण नहीं हुआ है।जिला शिक्षा पदाधिकारी द्वारा बार बार टाल मटोल किया जा रहा है। जबकि उच्च न्यायालय का आदेश और अपर मुख्य सचिव शिक्षा विभाग का 15 दिनों में वेतन भुगतान करने का निर्देश है। भ्रष्टाचार में डूबे हुए अधिकारी एवं कर्मचारी ने आर टी आईं को भी लटका दिया। मंशा साफ है बिल बनाने में रिश्वत चाहिए।
शशांक शुभंकर की पहचान एक तेज-तर्रार और जवाबदेह अधिकारी के रूप में रही है —
जहाँ भी रहे, विकास का पर्याय बने।
गया जैसे बड़े और संवेदनशील जिले में उनसे अपेक्षाएँ स्वाभाविक रूप से अधिक हैं।
निष्कर्ष
जनता दरबार का दरवाज़ा खुला है —
यह शुभ है।
DM शशांक शुभंकर की यह पहल गया जिले में जन-प्रशासन के बीच की खाई को पाटने का सार्थक प्रयास है।
लेकिन दरबार की सफलता का पैमाना आवेदकों की संख्या नहीं —
आदेशों के अनुपालन की दर होनी चाहिए।
कुजापी का आहर अतिक्रमण मुक्त होता है या नहीं, जमीन मापी समय पर होती है या नहीं —
यही इस दरबार की असली परीक्षा है।
जनता की उम्मीद है कि DM का निर्देश फाइल में नहीं, खेत और गली में दिखे।