गढ़वा में विकास बना विनाश,दो साल से अधूरी सड़क ने छीना सुकून
गढ़वा- एक ऐसा शहर,जहां इन दिनों सड़क नहीं बन रही,बल्कि लोगों की ज़िंदगी रोज़ रोज़ बिखर रही है,सुबह की पहली किरण के साथ जहां कभी बाजार की चहल पहल शुरू होती थी,आज वहीं धूल का धुंधलका छाया रहता है,दुकानदार दुकान खोलने से पहले झाड़ू नहीं,बल्कि धूल के पहाड़ से जंग लड़ते हैं,सड़क पर चलने वाला हर शख्स अपने साथ एक अदृश्य डर लेकर चलता है सांस का डर,बीमारी का डर और भविष्य का डर।
पिछले दो साल से गढ़वा शहर से गुजरने वाली एनएच सड़क का निर्माण कार्य जारी है,कागजों में ये विकास की कहानी है,लेकिन ज़मीन पर ये दर्द की दास्तान बन चुकी है,जहां सड़क बननी थी,वहां अधूरापन पसरा है,कहीं गिट्टी बिखरी है,कहीं गड्ढे मुंह बाए खड़े हैं और हर गुजरती गाड़ी अपने पीछे ऐसा धूल का गुबार छोड़ जाती है,जैसे शहर को धीरे धीरे ढक रही हो।
इस धूल ने सिर्फ कपड़े और दुकानें ही नहीं ढकीं,बल्कि लोगों की सांसों पर भी कब्जा कर लिया है,स्थानीय लोग बताते हैं कि खांसी,सांस फूलना और टीबी जैसी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है,जिन लोगों को पहले से श्वसन संबंधी दिक्कत थी,उनके लिए ये सड़क किसी सजा से कम नहीं।
इसी पीड़ा और आक्रोश को आवाज़ दिए गढ़वा के विधायक सत्येंद्रनाथ तिवारी ने,उन्होंने इस मुद्दे को सिर्फ राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं रखा,बल्कि खुलकर उस दर्द को सामने रखा जिसे शहर का हर आम नागरिक रोज़ महसूस कर रहा है।
विधायक सत्येंद्रनाथ तिवारी ने साफ कहा कि ये सड़क लोगों की सुविधा के लिए बन रही थी,लेकिन आज यही सड़क लोगों के लिए आफत बन चुकी है,प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच थी कि सड़कें बनें,ताकि जनता को राहत मिले,उनका जीवन आसान हो,लेकिन गढ़वा में हो रहा निर्माण उस सोच के बिल्कुल उलट दिखाई देता है,उन्होंने सीधे तौर पर निर्माण कार्य में लापरवाही का आरोप संवेदक और इंजीनियर पर लगाया,उनका कहना है कि सड़क निर्माण में न तो तय मानकों का पालन हो रहा है और न ही इंजीनियरिंग मैनुअल का,काम ऐसा किया जा रहा है,मानो किसी को जवाबदेही का डर ही नहीं।