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A Sufi Message of Spiritual Liberty"

हज़रत इनायत ख़ान टीपू सुल्तान (मैसूर के प्रसिद्ध अठारहवीं सदी के शासक) के पर-परपोते थे। वह एक बेहतरीन संगीतकार थे और 1920 ई. में संगीत कार्यक्रमों के लिए पश्चिमी देशों की यात्रा करने लगे। शेख मुहम्मद अबू हाशिम मदनी ने उन्हें चिश्ती सिलसिले में बैअत कराया, जिसके बाद हज़रत इनायत ख़ान एक सूफ़ी शिक्षक बन गए। उन्होंने एक अमेरिकी महिला ओरा रे बेकर से विवाह किया और उनके चार बच्चे हुए। बाद में वे फ्रांस के पेरिस शहर के पास सुरेने (Suresnes) में जाकर बस गए।

हज़रत इनायत ख़ान ने सूफ़ी शिक्षा को इस रूप में आगे बढ़ाया कि वे अपने अनुयायियों से इस्लाम अपनाने की अपेक्षा नहीं करते थे। अपनी पहली किताब "A Sufi Message of Spiritual Liberty" में उन्होंने सूफ़ी मत को "प्यार, सद्भाव और खूबसूरती की आध्यात्मिक दर्शनशास्त्र" बताया। इसी पुस्तक के माध्यम से उन्होंने पश्चिमी देशों में आध्यात्मिक मार्गदर्शन का विचार पहुँचाया।

उनकी बेटी नूर इनायत ख़ान द्वितीय विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश विशेष ऑपरेशन में एजेंट बनीं। वे नाज़ी कब्जे वाले फ्रांस में भेजी जाने वाली पहली महिला रेडियो ऑपरेटर थीं, जहाँ उन्होंने फ्रेंच रेजिस्टेंस की मदद की। जर्मनों ने उन्हें पकड़ लिया और 1944 ई. में मात्र 30 वर्ष की आयु में उन्हें फाँसी दे दी गई। उनकी बहादुरी के सम्मान में ब्रिटेन और फ्रांस दोनों ने उन्हें अपनी सर्वोच्च नागरिक उपाधि (posthumously) से सम्मानित किया।

1927 ई. में हज़रत इनायत ख़ान के इंतकाल के बाद उनके बेटे पीर विलायत ख़ान ने उनकी जगह संभाली। फिर पीर विलायत ख़ान के निधन के बाद उनके बेटे पीर ज़िया ख़ान ने सुफ़ी ऑर्डर इंटरनेशनल के प्रमुख के रूप में नेतृत्व संभाला।

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