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12-12 घंटे की ड्यूटी पर विवाद: CITU ने केंद्र सरकार को घेरा, 35% छंटनी का जताया खतरा

देश में श्रम कानूनों और काम के घंटों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। 12-12 घंटे की ड्यूटी लागू करने की चर्चाओं और कुछ क्षेत्रों में इसके प्रयोग को लेकर मजदूर संगठनों ने कड़ा विरोध जताया है। प्रमुख ट्रेड यूनियन CITU (सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स) ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि यह व्यवस्था मजदूरों के हितों के खिलाफ है और इससे बड़े पैमाने पर छंटनी का रास्ता साफ हो सकता है।

क्या है पूरा मामला?

मजदूर संगठनों का कहना है कि यदि कंपनियों में 8 घंटे की बजाय 12 घंटे की शिफ्ट लागू की जाती है, तो एक ही कर्मचारी से अधिक समय तक काम लिया जाएगा। इससे कंपनियों को अतिरिक्त कर्मचारियों की जरूरत कम पड़ेगी और नतीजतन एक शिफ्ट के कई कामगारों की नौकरी स्वतः समाप्त हो सकती है।

CITU का आरोप

CITU ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वह नए श्रम कानूनों के जरिए काम के घंटों को बढ़ावा दे रही है, जिससे उद्योगपतियों को फायदा और मजदूरों को नुकसान होगा। संगठन के अनुसार:

12 घंटे की ड्यूटी से रोजगार के अवसर घटेंगे

काम का दबाव और शारीरिक-मानसिक थकान बढ़ेगी

श्रमिकों के स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन पर नकारात्मक असर पड़ेगा

संगठन ने इसे “छिपी हुई छंटनी” करार देते हुए कहा कि यह नीति बेरोजगारी को और बढ़ा सकती है।

सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार का कहना है कि नए श्रम संहिताओं (Labour Codes) में काम के घंटों को लेकर लचीलापन दिया गया है। सरकार के अनुसार:

12 घंटे की शिफ्ट पूरी तरह अनिवार्य नहीं है

सप्ताह में कुल कार्य-घंटों की सीमा (48 घंटे) को ध्यान में रखा जाएगा

अतिरिक्त समय के लिए ओवरटाइम का प्रावधान रहेगा

हालांकि, मजदूर संगठन इस तर्क से संतुष्ट नहीं हैं और उन्हें आशंका है कि व्यवहार में कंपनियां इसका गलत फायदा उठा सकती हैं।

विशेषज्ञों की राय

श्रम मामलों के जानकारों का मानना है कि 12 घंटे की शिफ्ट लागू करने से:

उत्पादकता कुछ समय के लिए बढ़ सकती है

लेकिन लंबे समय में कर्मचारियों की कार्यक्षमता और स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है

रोजगार सृजन की गति धीमी हो सकती है

विरोध और आगे की रणनीति

CITU और अन्य ट्रेड यूनियनों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाया, तो देशभर में आंदोलन तेज किया जाएगा। संगठनों ने मजदूरों से एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की अपील की है।

निष्कर्ष
12 घंटे की ड्यूटी का मुद्दा सिर्फ काम के समय का नहीं, बल्कि रोजगार, श्रमिक अधिकार और सामाजिक संतुलन से जुड़ा हुआ है। एक ओर सरकार इसे लचीलापन और सुधार बता रही है, वहीं मजदूर संगठन इसे रोजगार पर खतरा मान रहे हैं। आने वाले समय में यह मुद्दा श्रम नीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

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