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'अब कभी नहीं लौटूंगा दोस्त...' गुजरात में रोजी-रोटी का संकट, सूरत स्टेशन पर उमड़ा सैलाब; 3 लाख मजदूरों का पलायन!

सूरत/गुजरात:
"अब नहीं आऊंगा दोस्त, उन्हें कह देना मैं वापस नहीं आऊंगा!"... एक श्रमिक के ये भारी शब्द आज गुजरात के सूरत रेलवे स्टेशन की उस कड़वी हकीकत को बयां कर रहे हैं, जिसने औद्योगिक गलियारों में सन्नाटा पस्रर दिया है। मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में जारी युद्ध और संघर्ष की आग अब भारत के किचन और कारखानों तक पहुँच चुकी है। एलपीजी (LPG) की भारी किल्लत के कारण सूरत का विख्यात कपड़ा उद्योग घुटनों पर आ गया है, जिससे लाखों मजदूरों के सामने भूखों मरने की नौबत आ गई है।
​ संकट के मुख्य कारण
​गैस का अकाल:
टेक्सटाइल इंडस्ट्री को रोजाना 15,000 सिलेंडर की जरूरत है, लेकिन आपूर्ति ठप है।
​उत्पादन में भारी गिरावट:
रोजाना होने वाला 6.5 करोड़ मीटर कपड़ा उत्पादन गिरकर 4.5 करोड़ मीटर रह गया है।
​महा-पलायन:
काम बंद होने से अब तक 3 लाख से ज्यादा यूपी-बिहार के श्रमिक शहर छोड़ चुके हैं।
​स्टेशन पर कोहराम:
सूरत के उधना स्टेशन पर हजारों की भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा।
​भीषण गर्मी और लाठीचार्ज: उधना स्टेशन बना जंग का मैदान
​रविवार को सूरत के उधना रेलवे स्टेशन पर जो मंजर दिखा, उसने रूह कंपा दी। चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी के बीच हजारों श्रमिक यूपी-बिहार जाने वाली ट्रेनों में जगह पाने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे। स्थिति तब बेकाबू हो गई जब यात्रियों ने बैरिकेड्स तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश की। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस और RPF को हल्का बल प्रयोग (लाठीचार्ज) करना पड़ा। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में लोग जान बचाने के लिए लोहे की रेलिंग फांदते नजर आ रहे हैं।
​क्यों रुक गया 'भारत का मैनचेस्टर'?
​सूरत के कपड़ा उद्योग की जान गैस सिलेंडर पर टिकी है। गैस की कमी के कारण मिलें बंद हो रही हैं, जिससे दिहाड़ी मजदूरों के पास न तो काम बचा है और न ही सिर छुपाने का किराया।
​"जब चूल्हा ही नहीं जलेगा और मशीन ही नहीं चलेगी, तो हम यहाँ रहकर क्या करेंगे?" - स्टेशन पर खड़ा एक बेबस मजदूर।
​रेलवे की सफाई
​रेलवे अधिकारी अनुभव सक्सेना के अनुसार, दोपहर तक 6 विशेष ट्रेनों से 21 हजार से ज्यादा यात्रियों को रवाना किया गया। रेलवे का कहना है कि वे अतिरिक्त ट्रेनें चला रहे हैं, लेकिन भीड़ इतनी अनियंत्रित है कि व्यवस्था बनाए रखना मुश्किल हो रहा है।
​निष्कर्ष: भविष्य पर संकट के बादल
​यह केवल छुट्टियों की भीड़ नहीं, बल्कि एक आर्थिक त्रासदी है। यदि गैस संकट जल्द दूर नहीं हुआ, तो सूरत के कपड़ा उद्योग को अपूरणीय क्षति होगी। 'अब नहीं आऊंगा' कहने वाले इन मजदूरों की सिसकियां प्रशासन और सिस्टम के लिए एक बड़ी चेतावनी हैं।

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