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"पगड़ी की कसम से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक " — सम्राट चौधरी और बिहार की करवट,



विजय कुमार,वरिष्ठ पत्रकार

नीतीश युग के अवसान के बाद बिहार
राजनीति की इस भूमि पर कहावत पुरानी है —
"जो आज विरोधी है, वह कल का उत्तराधिकारी हो सकता है।"
बिहार की राजनीति ने एक बार फिर इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया। जिस सम्राट चौधरी ने कभी नीतीश कुमार को सत्ता से हटाने की कसम खाते हुए अपने सिर पर 'मुरेठा' (पगड़ी) बांधी थी, उन्हीं सम्राट ने 15 अप्रैल 2026 को पटना के राजभवन में नीतीश के उत्तराधिकारी के रूप में बिहार के 24वें मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
और जब शपथ हुई, तो नीतीश कुमार स्वयं वहाँ मौजूद थे — मुस्कुराते हुए, आशीर्वाद देते हुए।

बिहार की राजनीति का ऐतिहासिक मोड़
14 अप्रैल 2026 को नीतीश कुमार ने अपनी अंतिम कैबिनेट बैठक के बाद राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन को इस्तीफा सौंप दिया। लगभग दो दशकों तक बिहार की सत्ता के केंद्र में रहे नीतीश कुमार राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद दिल्ली की राह पकड़ चुके हैं। उनके जाने के साथ ही एक युग की समाप्ति हुई और एक नए राजनीतिक अध्याय का आरंभ।
भाजपा विधायक दल की बैठक में केंद्रीय पर्यवेक्षक शिवराज सिंह चौहान ने सम्राट चौधरी के नाम की घोषणा की। दिलचस्प बात यह रही कि एनडीए की संयुक्त बैठक में स्वयं नीतीश कुमार ने सम्राट के नाम का प्रस्ताव रखा — जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया।
राजद की पाठशाला से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक
16 नवंबर 1968 को मुंगेर जिले के लखनपुर गाँव में जन्मे 57 वर्षीय सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रहा।

1990 में राष्ट्रीय जनता दल से राजनीति शुरू की। 1999 में राबड़ी देवी सरकार में महज 19 साल की उम्र में कृषि राज्यमंत्री बने — लेकिन न्यूनतम आयु विवाद के चलते राज्यपाल ने उन्हें पद से हटा दिया। हार ने उन्हें तोड़ा नहीं। 2000 और 2010 में परबत्ता से विधायक चुने गए। 2014 में राजद छोड़कर जदयू, फिर 2017 में भाजपा का दामन थामा।
2023 में बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने। 2024 में नीतीश सरकार में उपमुख्यमंत्री। और अंततः 2026 में — मुख्यमंत्री।

यह सफर महज पद की सीढ़ियाँ नहीं है — यह धैर्य, रणनीति और राजनीतिक परिपक्वता का दस्तावेज है।
ओबीसी समीकरण और भाजपा की रणनीति
सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना भाजपा की सुचिंतित सामाजिक रणनीति का परिणाम है।

वे कोइरी-कुशवाहा समुदाय से आते हैं जो बिहार में यादवों के बाद दूसरा सबसे बड़ा ओबीसी वोटबैंक है। जनसंघ के जमाने से आज तक बिहार में गठबंधन की बैसाखी पर टिकी भाजपा अब पहली बार अपने दम पर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ गई है।
यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं — यह बिहार में भाजपा के 'किंगमेकर से किंग' बनने की यात्रा का पूर्णविराम है।
उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार राजनीति के दिग्गज रहे — सात बार विधायक और सांसद। माता पार्वती देवी भी तारापुर से विधायक रहीं। यह परिवार राजनीति की वह पाठशाला है जिसने सम्राट को हर उतार-चढ़ाव में तराशा।

चुनौतियाँ:
सिंहासन पर बैठना सरल, बिहार बदलना कठिन
सम्राट के सामने अब असली परीक्षा शुरू होती है। बिहार की कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी, पलायन और बुनियादी ढाँचे की चुनौतियाँ ज्यों की त्यों खड़ी हैं। अब "गठबंधन की मजबूरी" का बहाना उपलब्ध नहीं — भाजपा सीधे जवाबदेह होगी। 2029 के लोकसभा और आगे के विधानसभा चुनावों की पटकथा आज से ही लिखी जाने लगेगी।
बिहार के इतिहास में केवल जननायक कर्पूरी ठाकुर ही उपमुख्यमंत्री से मुख्यमंत्री बनने वाले नेता रहे। सम्राट चौधरी दूसरे ऐसे नेता हैं जिन्होंने यह दुर्लभ सफर तय किया।

दृष्टि:
पगड़ी की कसम कभी-कभी शपथ में बदल जाती है। सम्राट चौधरी की यात्रा बिहार की राजनीति की जटिलता का जीवंत प्रमाण है — जहाँ विरोध और विरासत, दोनों एक साथ चलते हैं। अब देखना यह है कि 'सम्राट युग' केवल राजनीतिक इतिहास की एक पंक्ति बनता है या सच में बिहार के आम लोगों की जिंदगी बदलता है।

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