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"बाल विवाह नहीं, बचपन बचाओ " अक्षय तृतीया पर गया में उठी जागरूकता की लहर,



मंदिर परिसर में धर्मगुरुओं ने ली शपथ, प्रशासन और NGO का अनूठा संयुक्त प्रयास,

विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार

अक्षय तृतीया —
वह पर्व जिसे हिंदू परंपरा में "अबूझ मुहूर्त" कहा जाता है,
यानी जिस दिन बिना पंचांग देखे विवाह जैसे शुभ कार्य किए जा सकते हैं।
लेकिन इसी "अबूझ मुहूर्त" की आड़ में सदियों से एक अभिशाप भी पलता रहा है — बाल विवाह।

इस कुरीति की काली छाया को मिटाने के लिए इस वर्ष अक्षय तृतीया (19 अप्रैल 2026) से ठीक एक दिन पूर्व, शनिवार 18 अप्रैल को गया जिले के मानपुर प्रखंड अंतर्गत कईया पंचायत के तेतरिया पंचमुखी मंदिर परिसर में एक ऐतिहासिक पहल की गई।

महिला एवं बाल विकास निगम, गया और प्रयास जेएसी संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यशाला में धार्मिक गुरुओं, पंचायत प्रतिनिधियों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सैकड़ों ग्रामीणों ने एक साथ बाल विवाह न करने और न होने देने का संकल्प लिया। जो बात इस आयोजन को विशिष्ट बनाती है, वह यह है कि यह शपथ किसी सरकारी दफ्तर में नहीं, बल्कि मंदिर के प्रांगण में — धार्मिक प्रतीकों के साथ — ली गई।
यह एक स्वागतयोग्य रणनीतिक बदलाव है। जब पुजारी और धर्मगुरु स्वयं बाल विवाह न कराने की शपथ लेते हैं, तो सामाजिक संदेश कानूनी दंड से कहीं अधिक गहरा उतरता है।

कानून क्या कहता है?
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के अनुसार लड़की के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लड़के के लिए 21 वर्ष निर्धारित है।
इस कानून में विशेष रूप से अक्षय तृतीया जैसे पर्वों पर जिला मजिस्ट्रेट को बाल विवाह रोकने की विशेष शक्तियाँ दी गई हैं।
कानून का उल्लंघन करने पर 2 वर्ष तक कठोर कारावास और एक लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है। यह दंड केवल माता-पिता पर नहीं, बल्कि विवाह में शामिल पंडित, बैंड-बाजे वाले, सजावट करने वाले और समारोह स्थल प्रदाता — सभी पर लागू होता है।

संकल्प की शक्ति:
जिला प्रोग्राम पदाधिकारी डॉ. रश्मि वर्मा ने स्पष्ट किया कि इस वर्ष अक्षय तृतीया पर किसी भी बाल विवाह की शिकायत मिलने पर तत्काल कानूनी कार्यवाही की जाएगी।
प्रयास संस्था के जिला समन्वयक देवेंद्र कुमार मिश्रा ने बताया कि धर्मगुरुओं को विशेष रूप से बाल विवाह न संपन्न कराने की शपथ दिलाना इस अभियान की रणनीतिक धुरी है।
यह दृष्टिकोण सराहनीय है, क्योंकि ग्रामीण समाज में पुरोहित और धर्मगुरुओं की स्वीकृति बिना कोई भी विवाह नहीं होता।

बड़ा सवाल: क्या संकल्प काफी है?
शपथ और कार्यशाला समाज को जगाने का पहला कदम हैं, परंतु पर्याप्त नहीं।
गया जैसे जिले में आज भी ग्रामीण इलाकों में कम उम्र में विवाह की परंपरा जड़ें जमाए है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार 20-24 वर्ष की 23 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 वर्ष से पहले हो जाती है।
प्रशासन को चाहिए कि कार्यशालाओं के साथ-साथ निगरानी तंत्र, ग्राम-स्तरीय बाल संरक्षण समितियों की सक्रियता और शिकायत तंत्र को भी मजबूत किया जाए। धर्म और कानून का यह संयुक्त मोर्चा तभी सफल होगा जब जमीनी क्रियान्वयन भी उतना ही दृढ़ हो।
कईया पंचायत के मुखिया विजय ठाकुर, मंदिर के पुजारी रविंद्र कुमार पाण्डेय, जिला मिशन समन्वयक सुशांत आनंद और प्रयास संस्था के कार्यकर्ता गौतम परमार, विनोद कुमार, प्रियंका कुमारी, मोहम्मद आलमगीर सहित सैकड़ों ग्रामीणों की उपस्थिति यह सिद्ध करती है कि समाज बदलाव के लिए तैयार है।

टिप्पणी:
पंचमुखी मंदिर के प्रांगण में उठी यह आवाज़ महज एक कार्यशाला की गूंज नहीं है — यह एक सभ्य समाज की पुकार है।
जब धर्म और कानून मिलकर बचपन की रक्षा का संकल्प लेते हैं, तो उम्मीद जगती है कि आने वाली अक्षय तृतीया पर गया जिले में कोई बच्चा जबरन विवाह की बेड़ियों में नहीं जकड़ा जाएगा।

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