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हमारा प्यारा बद्दे का पेड़। आए तूफ़ान ने नूर महल की रूह का एक हिस्सा अपने साथ ले लिया . Hamza mia

कल रात आए तूफ़ान ने नूर महल की रूह का एक हिस्सा अपने साथ ले लिया — हमारा प्यारा बद्दे का पेड़।
एक सदी से भी ज़्यादा समय तक यह मज़बूती से खड़ा रहा, अपनी छाया में पीढ़ियों को गुजरते हुए देखता रहा। हर रामपुरी को याद है मेरे दादा, मिकी मियाँ, का इस पेड़ के नीचे बैठकर लोगों से मिलना। मेरी दादी आज भी अब्बा के बचपन के उन पिकनिक की कहानियाँ सुनाती हैं, जो इसी पेड़ की छाँव में गुज़रीं।
मेरी अपनी भी यादें इससे जुड़ी हैं — बचपन की गर्मियों में इसकी शाखाओं पर चढ़ना, और हाल के वर्षों में सर्दियों की दोपहरें परिवार के साथ इसकी छाँव में धूप सेंकते हुए, बाहर बैठकर खाना खाना।
सौ साल से भी ज़्यादा पुराना यह पेड़ अनगिनत तूफ़ानों का सामना करता रहा, लेकिन अफसोस, कल रात उसका आख़िरी तूफ़ान साबित हुआ।
कुछ चीज़ें सिर्फ खोती नहीं हैं — वे यादों में, कहानियों में, और हममें ज़िंदा रहती हैं।
Lucknow

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