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संपादकीय लेख ( Bengali Newspaper : Sangbad Pratidin) का मंथन : शिक्षा मिलेगी? (क्या वे इससे सबक लेंगे?)



लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत जुटाने में विफल रहने के कारण मोदी सरकार पहली बार किसी विधेयक को पारित कराने में असमर्थ रही। क्या वे इस अनुभव से कुछ सीखेंगे?

राजनीति में विभिन्न प्रकार की शब्दावलियों और "चमक" (हैरतअंगेज फैसलों) के जरिए माहौल बनाना नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भाजपा की एक प्रमुख विशेषता रही है। विशेष रूप से महत्वपूर्ण चुनावों से पहले, वे अक्सर जनता के सामने ऐसी योजनाएं लाते हैं जो ध्रुवीकरण या बड़े बदलाव का संकेत देती हैं।

मुख्य बिंदु:

विधेयक का उद्देश्य और विवाद: लोकसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित करने के मुद्दे को जब सरकार सामने लाई, तो उसे 'परिसीमन' (Delimitation) के साथ जोड़ दिया गया। विपक्ष का आरोप है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों से पहले अचानक सत्र बुलाकर इस प्रक्रिया को शुरू करना राजनीतिक लाभ के लिए था।

​ऐतिहासिक संदर्भ: लेख में बताया गया है कि पूर्व में गीता मुखर्जी की अध्यक्षता वाली समिति ने सबसे पहले इसकी सिफारिश की थी। 2010 में यह राज्यसभा में पारित हुआ था, लेकिन लोकसभा में अटक गया।

​वर्तमान स्थिति: 2023 में मोदी सरकार 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' लेकर आई। इसमें शर्त रखी गई कि 2027 की जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन के आधार पर ही महिला आरक्षण लागू होगा। इसका अर्थ यह है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सीटें बढ़ने की संभावना है (संभावित रूप से 840 तक), और तभी यह आरक्षण प्रभावी होगा।

विपक्ष का रुख: विपक्षी दलों का तर्क है कि सरकार का असली उद्देश्य केवल सीटों की संख्या बढ़ाकर भाजपा की जीत सुनिश्चित करना है, न कि वास्तव में महिला सशक्तिकरण। विपक्ष ने सवाल उठाया है कि आरक्षण के मुद्दे पर राज्यों या अन्य दलों से व्यापक चर्चा क्यों नहीं की गई।

निष्कर्ष
​लेख का निष्कर्ष यह है कि मोदी सरकार, जो अब तक अपने संख्या बल के आधार पर विधेयकों को आसानी से पारित कराती रही थी, इस बार लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं जुटा पाई। यह पहली बार है जब सरकार को इस तरह की विधायी असफलता का सामना करना पड़ा है।
​विपक्ष ने महिला आरक्षण को एक "ढाल" या चुनावी हथियार (शिखंडी) के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। अंत में, लेख यह बड़ा सवाल छोड़ता है कि: क्या सरकार अपनी इस रणनीतिक विफलता से कोई सबक लेगी या फिर भविष्य में भी बिना सर्वसम्मति के इसी तरह के 'सरप्राइज' कार्ड खेलती रहेगी?

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