बिना सुने, बिना नोटिस — करोड़ों जब्त कर लिए:
"पटना हाई कोर्ट ने रोहतास-भोजपुर DM के आदेश किए निरस्त"
विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार
बालू घाट की नीलामी जीती, करोड़ों की सुरक्षा राशि जमा की, फिर मानसून ने घाट खाली कर दिए। खनन असंभव हो गया — तो उद्यमियों ने प्रतीक्षा की। लेकिन प्रशासन ने न नोटिस दिया, न सुनवाई का मौका — और एक झटके में करोड़ों रुपये की सुरक्षा राशि जब्त कर ली।
16 अप्रैल 2026 को पटना उच्च न्यायालय ने इस पूरी कार्रवाई को "अवैध" घोषित करते हुए रोहतास और भोजपुर के जिलाधिकारियों के आदेश निरस्त कर दिए। न्यायमूर्ति संदीप कुमार की एकल पीठ ने अपने 29 पृष्ठीय फैसले में प्रशासन की इस मनमानी को "घोर उल्लंघन" बताया।
⚖️ मामले की पृष्ठभूमि — क्या हुआ था?
याचिकाकर्ता बिमल कुमार एवं अन्य ने ई-नीलामी में सफलतापूर्वक बोली लगाकर रोहतास बालू घाट संख्या-13 और भोजपुर बालू घाट संख्या-01 के अधिकार प्राप्त किए थे। नीलामी के समय उन्होंने घाटों का निरीक्षण कर रेत की पर्याप्त उपलब्धता पाई थी।
लेकिन इसके बाद स्थिति बदल गई। 2023 के मानसून के बाद रेत का पर्याप्त पुनर्भरण नहीं हुआ, जिससे घाटों की खनिज क्षमता में भारी कमी आई। याचिकाकर्ताओं ने खनन शुरू करने से इनकार किया क्योंकि इससे उन्हें भारी वित्तीय नुकसान होता।
यहाँ एक और गंभीर प्रशासनिक चूक उजागर हुई। Enforcement & Monitoring Guidelines for Sand Mining, 2020 (EMGSM, 2020) के तहत प्रत्येक मानसून के बाद पुनर्भरण अध्ययन अनिवार्य है — लेकिन 2023 के मानसून के बाद यह अध्ययन किया ही नहीं गया।
अर्थात् जिस आधार पर राशि जब्त की गई, वह आधार स्वयं अधूरा और अवैध था।
प्रशासन की कार्रवाई और न्यायालय की फटकार
कलेक्टर, रोहतास ने मेमो सं0-758, दिनांक 11.05.2024 और कलेक्टर, भोजपुर ने मेमो सं0-1919, दिनांक 29.04.2024 द्वारा सुरक्षा राशि जब्त करने के आदेश पारित किए।
न्यायालय ने पाया कि करोड़ों रुपये की सुरक्षा राशि जब्त करने की कार्रवाई बिना किसी पूर्व नोटिस या सुनवाई का अवसर दिए की गई, जो कानूनी मानदंडों का "घोर उल्लंघन" है।
न्यायमूर्ति संदीप कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "सुनवाई से पहले कार्रवाई" (hearing before action) का सिद्धांत विधि के शासन की आधारशिला है और प्रशासनिक निर्णयों में इसका पालन अनिवार्य है।
फैसले के मुख्य निर्देश
न्यायालय ने रोहतास और भोजपुर के कलेक्टरों के आदेश निरस्त करते हुए मामले को वापस उनके पास भेज दिया। अब उन्हें याचिकाकर्ताओं को उचित सुनवाई का अवसर देने के उपरांत और ताज़ा पुनर्भरण अध्ययन रिपोर्ट के आधार पर नया "reasoned and speaking order" पारित करना होगा।
इसके साथ ही अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि संबंधित बालू घाटों के लिए 8 सप्ताह के भीतर एक नया वैज्ञानिक पुनर्भरण अध्ययन किसी सक्षम प्राधिकरण या संस्था द्वारा कराया जाए — जिसका खर्च याचिकाकर्ता स्वयं वहन करेंगे।
यह फैसला क्यों है मिसाल?
बिंदु
महत्व
नोटिस के बिना जब्ती — अवैध
प्रत्येक वित्तीय दंड से पहले नोटिस अनिवार्य
EMGSM 2020 का उल्लंघन
मानसून के बाद अध्ययन न कराना प्रशासन की चूक
"Speaking Order" का निर्देश
मनमाने आदेश नहीं — कारण देना होगा
वैज्ञानिक अध्ययन अनिवार्य
प्राकृतिक संसाधन नीति में साक्ष्य आधारित निर्णय
बिहार में बालू खनन वर्षों से विवादों का केंद्र रहा है। एक तरफ अवैध खनन पर कार्रवाई की माँग है, दूसरी तरफ वैध खनन अधिकार प्राप्त उद्यमियों के साथ प्रशासन का यह व्यवहार — बिना सुने, करोड़ों जब्त कर लो।
यह फैसला दो संदेश देता है। पहला — प्रशासन को यह भ्रम छोड़ना होगा कि "सरकारी आदेश" का अर्थ "न्यायसंगत आदेश" है। दूसरा — प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में वैज्ञानिक प्रमाण और कानूनी प्रक्रिया दोनों अनिवार्य हैं।
EMGSM 2020 जैसे दिशा-निर्देश बने हैं तो उनका पालन भी होना चाहिए। जब प्रशासन स्वयं नियमों की अनदेखी करे और फिर उद्यमियों को दंडित करे — तो न्यायालय का हस्तक्षेप अपरिहार्य हो जाता है।
"सुनवाई का अवसर" — यह केवल कानूनी अधिकार नहीं, यह लोकतांत्रिक प्रशासन का नैतिक दायित्व है।
केस विवरण
विवरण
तथ्य
मामला
बिमल कुमार बनाम बिहार राज्य
फैसला तिथि
16 अप्रैल 2026
न्यायपीठ
न्यायमूर्ति संदीप कुमार (एकल पीठ)
निरस्त आदेश
रोहतास: मेमो 758/11.05.2024, भोजपुर: मेमो 1919/29.04.2024
घाट
रोहतास Sand Ghat No.13, भोजपुर Sand Ghat No.01
पुनर्भरण अध्ययन
8 सप्ताह, खर्च याचिकाकर्ता पर