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शाहपुर पटोरी नगर परिषद: विकास के दावों के बीच भ्रष्टाचार का 'अंधेर नगरी' खेल !

"कमीशन के पैसों की चकाचौंध से जनप्रतिनिधि अभिभूत हैं, पटोरी की जनता विकास की राह ताकते भ्रष्टाचार के अंधेरे में चुप है।"

शाहपुर पटोरी, जो कभी अपनी व्यापारिक गरिमा और समृद्ध सामाजिक ताने-बाने के लिए विख्यात था, आज प्रशासनिक कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार का एक जीवंत स्मारक बन गया है।

पटोरी की सामाजिक और आधारभूत संरचना अभी इस स्तर की नहीं हुई थी कि इसे 'नगर परिषद' का दर्जा दिया जाए। लेकिन यदि राजस्व वसूली के उद्देश्य से इसे नगर घोषित कर ही दिया गया, तो यक्ष प्रश्न यह है कि क्या पिछले पाँच वर्षों में यहाँ उस स्तर का विकास हुआ? करोड़ों का बजट पास करने वाली यह संस्था आज जन-प्रतिनिधियों और सरकारी बाबुओं के लिए केवल 'धन उगाही' का एक सुलभ ज़रिया बनकर रह गई है।

कागजों पर ' स्वर्ग ' और ज़मीन पर 'नरक' :

ग्राम पंचायत से सीधे नगर परिषद का सफर तय करने वाला यह क्षेत्र आज विकास के बजाय विनाश की ढलान पर है। जहाँ ₹100 करोड़ से अधिक का वार्षिक बजट फाइलों में दौड़ रहा है, वहीं धरातल पर स्थितियाँ किसी नरक से बदतर हैं।

नगर परिषद के गठन के पाँच साल बाद भी न तो व्यावसायिक भूमि की मापी हुई और न ही आवासीय संपत्तियों का उचित मूल्यांकन। विडंबना देखिए, बिना किसी ठोस सर्वे या वैज्ञानिक आधार के 'टोटो' घुमाकर जनता को जुर्माने की धमकी दी जा रही है। जब किसी भू-स्वामी को यह पता ही नहीं कि उसका टैक्स किस मानक पर तय हुआ है, तो वह भुगतान क्यों करे?

यह प्रशासन द्वारा जनता का मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न नहीं तो और क्या है?

कमीशनखोरी की 'हाई मास्ट' लूट :

पटोरी के हर चौराहे पर कमीशनखोरी का खेल सरेआम है। लाखों की लागत से लगी स्ट्रीट लाइटें और हाई मास्क लाइटें भ्रष्टाचार की गवाह बन चुकी हैं। शहर के "कोठी स्थित मुख्य मार्ग" की लाइटें महीनों से बंद हैं। कार्यपालक पदाधिकारी (EO) से लेकर वार्ड पार्षद और मुख्य पार्षद तक, सब जानकर भी मौन हैं। यह चुप्पी अकारण नहीं है—यह उस 'मोटी कमीशन' का परिणाम है, जिसने जनता की आवाज़ को दबा दिया है।

स्वच्छता के नाम पर 'बदबू' का साम्राज्य :

सौ करोड़ का बजट होने के बावजूद पहली बारिश में ही पटोरी की सड़कें ताल-तलैया बन जाती हैं। हर कोने पर पसरा कूड़े का अंबार और उससे उठती सड़ांध स्वास्थ्य के प्रति प्रशासन की संवेदनहीनता को चीख-चीख कर बता रही है। सफाई के नाम पर लाखों का वारा-न्यारा होता है, मगर आम आदमी का रास्ता आज भी बदबू रोकती है।

लगान का 'अजीबो-गरीब' गणित: पटोरी से अगर पड़ोस के नगर परिषद हाजीपुर की तुलना करें तो पटोरी की जनता पर दोहरी मार है। यहाँ लगान की दरें हाजीपुर जैसे विकसित नगर परिषद से भी कई गुना अधिक हैं, जो तर्क से परे है।

तुलनात्मक विश्लेषण:

| क्षेत्र | रकबा (धुर) | मालगुजारी | सेस | कुल राशि |
| :--- | :--- | :--- | :--- | :--- |
| **हाजीपुर** | 11 धुर | ₹20 | ₹29 | **₹49/-** |
| **पटोरी** | 08 धुर | ₹50 | ₹72.50 | **₹122.50/-** |

हाजीपुर से कम रकबे के बावजूद ढाई गुना अधिक टैक्स वसूलना सीधे तौर पर प्रशासनिक तानाशाही है। क्या पटोरी की ज़मीन हाजीपुर से अधिक कीमती हो गई है या यह केवल अवैध वसूली का नया मॉडल है? जबकि हाजीपुर वैशाली जिले का मुख्यालय है ।

लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुर्भाग्य
जब व्यवस्था सुरक्षा के बजाय 'डर' पैदा करने लगे, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र संकट में है। आज पटोरी के नागरिक स्वेच्छा से नहीं, बल्कि भारी जुर्माने और सरकारी कार्रवाई के डर से टैक्स भर रहे हैं। रक्षक ही भक्षक बन चुके हैं।

शाहपुर पटोरी नगर परिषद आज विकास का पर्याय नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का सुरक्षित अड्डा है। यदि जल्द ही मापी प्रक्रिया को पारदर्शी नहीं बनाया गया, लगान की विसंगतियों को दूर नहीं किया गया और कमीशनखोरी पर नकेल नहीं कसी गई, तो यह जन-आक्रोश एक बड़े आंदोलन में बदल जाएगा। सरकार को चाहिए कि इस 'सफेद हाथी' बन चुकी संस्था की उच्चस्तरीय जाँच (High-level Enquiry) कराए।

"कमीशन की चमक में रोशनी गुम है,पटोरी की जनता बेबस और महँगी लगान की धुंध है।"

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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