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धार में स्थित माँ वाग्देवी मन्दिर भोजशाला की सुनवाई इंदौर उच्च न्यायालय में जारी।

इंदौर : धार के भोजशाला में स्थित माँ वाग्देवी के मंदिर परिसर को अतिक्रमण करियों से मुक्त कराने के लिए सुनवाई हुई जिसमें कहा गया कि राजा भोज द्वारा लिखित पुस्तक समरांगणसूत्रधार सूत्र में जिस यज्ञकुंड का उल्लेख है वही प्रकृति का यज्ञ कुंड सरस्वती कंठा भरण प्रसाद (भोज शाला ) के वर्तमान गर्भग्रह में वही स्वरूप में आज भी स्थित है।
भोजशाला मंदिर के स्तंभों की आकृति - समरांगणसूत्रधार एवं अन्य ऐतिहासिक पुस्तकों में दिए गए वर्णन से एवं अन्य परमार कालीन मंदिरों से पूरी तरह मेल खाती है। स्तम्भों पर उकेरी गयी कीर्तिमुख, घंटियाँ और कमल दल की आकृति भी समरांगणसूत्रधार में उल्लेखित वर्णन के ही अनुसार है।
भोजशाला मामले में लखनऊ से जन उद्घोष सेवा संस्थान के अध्यक्ष याचिककर्ता कुलदीप तिवारी द्वारा प्रस्तुत रिट याचिका में अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने लगातार दूसरे दिन दिनांक 15 अप्रैल को माननीय इंदौर उच्च न्यायालय को ब्रिटिश काल का सन 1908 का गज़ेटियर, सन 1304 की मेरूतुंग की किताब का हवाला देते हुए यह बताया कि हालिया विवादित ढांचा जिसे भोजशाला कहते हैं और जिसे पूर्व में सरस्वतीकंठाभरण एवं शारदा सदन के नाम से भी जाना जाता था।
आगे मनीष गुप्ता ने बताया कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने श्री राम मंदिर के संबंध में पारित आदेश में यह प्रतिपादित किया है कि पुरानी किताबों एवं ब्रिटिशकालीन सरकारी गज़ेटियर को संपोषक साक्ष्य के रूप में माना जा सकता है। उन्होंने न्यायालय को बताया कि विवादित स्थल राजा भोज द्वारा लिखित किताब 'समरांगणसूत्रधार' जो कि वास्तु शास्त्र पर आधारित है, के अनुसार ही बना है। विवादित इमारत कि लंबाई और चौड़ाई 6 और 4 के ठीक उसी अनुपात में है जैसी राजा भोज द्वारा अपनी किताब 'समरांगणसूत्रधार' में उल्लेख किया है। अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने न्यायालय के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत किए कि समरांगणसूत्रधार के अनुसार मंदिर के मध्य में चौकोर आकृति का एक हवन कुंड होना चाहिए जो कि 9 हस्त की लंबाई चौड़ाई का हो और ईंटों से ही बना हो, और पत्थरों से निर्मित इस पूरी प्रांगण में केवल हवन कुंड ही ईंटों से बना हुआ है और उसी अनुपात में बना हुआ है, जो सिद्ध करता है कि यह राजा भोज द्वारा ही बनवाया गया है।
भोजशाला मंदिर के स्तंभों की आकृति समरांगणसूत्रधार एवं अन्य ऐतिहासिक पुस्तकों में दिए गए वर्णन से एवं अन्य परमार कालीन मंदिरों से पूरी तरह मेल खाती है। स्तम्भों पर उकेरी गयी कीर्तिमुख, घंटियाँ और कमल दल की आकृति भी समरांगणसूत्रधार में उल्लिखित वर्णन के ही अनुसार है। ईसी प्रकार माँ वाग्देवी की मूर्ति की अभंग मुद्रा रायसेन व मंदसौर में प्राप्त अन्य परमार कालीन मूर्तियों से पूरी तरह मेल खाती है।
बहस के दौरान अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने माननीय न्यायालय को बताया गया कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय की पाँच जजों की खंड पीठ द्वारा पारित राम मंदिर निर्णय में इस सिद्धांत पर बल दिया गया कि यदि एक बार किसी स्थान पर एक मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है तो वह स्थान सदैव के लिए उस देवता में निहित हो जाता है और किसी मूर्ति या मंदिर को तोड़ देने से मंदिर का अस्तित्व समाप्त नहीं होता है। ऐसे ही इस्लामिक शरीयत कानून का हवाला देते हुए कहा गया कि शरीयत के मुताबिक अवैध कब्जा की हुई जमीन पर बनाई गयी मस्जिद अवैध है और उस में अता की जाने वाली नमाज अस्वीकार्य है।
अंत में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा प्रस्तुत सर्वे रिपोर्ट का हवाला देते हुए अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने कहा कि हवन कुंड में प्राप्त ईंटों और भोजशाला भवन की नीव में प्राप्त ईंटें एक ही स्थान से प्राप्त की गयी हैं। सर्वेक्षण के अनुसार भोजशाला भवन पुराने मंदिर की नीव पर ही निर्मित भवन है एवं पुराने मंदिर को तोड़कर इस भवन को बनाने का प्रयास किया गया है। मंदिर की खुदाई में प्राप्त सैकड़ों मूर्तियों एवं शिलालेखों में से भगवान ब्रह्मा की युवा वस्था वाली मूर्ति भी विशिष्ट है और ऐसा वर्णन केवल राजा भोज द्वारा रचित समरांगणसूत्रधार में ही मिलता है।
अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने कहा कि इन सभी तथ्यों से यह स्पष्ट होता है की भोजशाला माता सरस्वती को समर्पित एक हिन्दू मंदिर है और प्रतिवादी पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन करते हुए केवल हिंदुओं को मंदिर में पूजा की अनुमति देकर अन्य मजहब अथवा संप्रदाय के लोगों का प्रवेश वर्जित करना चाहिए।
अधिवक्ता श्रीश दुबे, भोजशाला मुक्ति यज्ञ संयोजक गोपाल शर्मा जी, अशोक जैन जी, राजेश बिंजवा, रवि सिकरवार, मोहन राठौर सुनवाई के दौरान उपस्थित रहे। उक्त जानकारी समिति के मीडिया प्रमुख मोहन राठौर द्वारा दी गई।

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